छत्तीसगढ़ को जन्मजात बिजलीगढ़ होने का गौरव प्राप्त है। स्थापना के समय से आज तक यह जीरो पावर कट स्टेट बना हुआ है। प्रदेश में मांग से अधिक बिजली की उपलब्धता बनी रहती है। यद्यपि अत्याधुनिक बिजली चालित घरेलू उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक वाहन, कल कारखाने, कृषि पंपों के कारण उत्पादन से अधिक उपभोग का आंकड़ा दर्ज होने लगा है। बिजली आज के समय में प्राण वायु की तरह हो चली है। बिन पानी रहा जा सकता है पर मिनट भर बिन बिजली के रहना जानलेवा कष्टकारी हो जाता है। ऐसी सुखदाई बिजली का दुरुपयोग अथवा मुफ्त में वितरण सर्व वर्ग के लिए हानिकारक होता जा रहा है।यह जगजाहिर है कि आम उपभोक्ताओं की तुलना में कई गुना अधिक बिजली का दुरुपयोग राज्य शासन के विभागों में हो रहा है। बड़े-बड़े आलीशान कार्यालय भवन में बैठे अधिकारी- कर्मचारी, नेता- मंत्री बिजली बचत के प्रति घोर लापरवाह दिखते हैं । उन्हें बिल भुगतान करना नहीं होता है, अत: बेफिक्री में डूबे रहते हैं। कक्ष छोड़कर बाहर जाते समय भी बिजली चालित उपकरणों को बंद करने का जहमत नहीं उठाते हैं। यही वजह है सरकारी विभागों का बिजली बिल भारी भरकम होता जाता है। एक आंकड़े के अनुसार सरकारी विभागों पर बत्तीस सौ करोड़ रुपया बकाया है। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी प्रबंधन इसे वसुलने में नाकाम बेबस लाचार बैठा है। मजे की बात है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री ही ऊर्जा मंत्री रहे हैं। शायद इसीलिए सभी सरकारी विभाग सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का के अंदाज में बेखौफ जीते रहे हैं।बिजली विभाग की बढ़ती कंगाली के लिए कहीं ना कहीं पिछले छब्बीस वर्षों से राज कर रहे राजनेता ही सबसे बड़े जिम्मेदार हैं। इसे संज्ञान में लेते हुए छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार सरकारी विभागों पर नकेल कसने की शुरुआत हुई है। इस सराहनीय कदम के तहत अगस्त माह से प्रीपेड सिस्टम लागू किया गया है। इस सिस्टम के अंतर्गत अब सभी सरकारी विभागों को अनुमानित खपत के आधार पर तीन माह का बिजली बिल एडवांस में जमा करना होगा। ऐसा करने में अक्षम विभागों की बिजली आपूर्ति रोक दी जाएगी।सुनने में यह कदम कारगर लग रहा है,पर इसे धरातल पर उतारने के लिए एड़ी चोटी एक करना होगा। बिजली विभाग को पसीना बहाना होगा। हालांकि इतिहास बताता है कि फुटी कौड़ी बिल वसूली नहीं होने पर भी बिजली बोर्ड के अधिकारियों- कर्मचारियों का बाल बांका नहीं होता। प्रदेश के बेलगाम होते सरकारी विभाग बिजली बिरयानी खाकर कुंभकरण की निद्रा में सो जाते है। बिजली विभाग भी इन्हें स्मरण पत्र भेजकर सो जाता है। इसे देखते हुए छत्तीसगढ़ में सुशासन लाने संकल्पित सजग सरकार ने सरकारी विभागों की बकाया बिजली बिल वसुली हेतु एक नया फरमान जारी किया है। जिसके अनुसार सरकारी विभागों को बकाया बिल राशि का भुगतान एक वर्ष के भीतर चार किस्तों में करना है। वैसे तो इतिहास बताता है कि ऐसे सरकारी फरमान गीदड़ भभकी ही होते रहे हैं। फुस्सी बम की तरह टायं टायं फिस हो कर ऐसे अनेक फरमान काल कवलित हो गए हैं, अथवा हाथी के दांत खाने के कुछ और दिखाने के कुछ सिद्ध हुए हैं। छत्तीसगढ़ राज बनने के बाद बिजली बोर्ड को पहली बार यह बेहतरीन मौका मिला है। इसका लाभ लेते हुए फिल्म शोले का डायलॉग लोहा गरम है ठोक दो हथोड़ा को करके दिखा देना चाहिए। एक पुरानी कहावत चली आ रही है एक कौवा को मार कर लटका दो तो बाकी कौवे डर जाते हैं। इसी नीति पर बिजली बोर्ड को चाहिए कि उधार में बिजली बिरियानी खाए बैठे दो चार कौवे विभागों की बत्ती गुल कर दे। इससे एक पंथ दो काज हो जाएगा। उधारी राशि मिल जाएगी तो बल्ले बल्ले ,नहीं मिली तो जनता की ओर से वाह वाही तो मिलेगी ही। सरकारी विभागों पर प्रीपेड सिस्टम स्मार्ट मीटर का चौकीदार बिठाने और बकाया बिजली बिल भुगतान करने की बाध्यता का साहस करने वाली सत्ता को जनता सलाम कर रही है। दावा किया जा रहा है कि प्रदेश के विकासखंड स्तर तक सभी सरकारी विभागों में स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं। अगर इसमें सच्चाई है तो यह बिजली विभाग की अभूतपूर्व अविश्वसनीय उपलब्धि है। विकासखंड स्तर तक शत प्रतिशत स्मार्ट मीटरी करण हो जाना प्रदेश के गुनीजनों के लिए सोच का और भावी इंजीनियरों के लिए शोध का विषय बन गया है। अंत में मंगलकामना सहित कहना होगा ‘विष्णु देव के राज म दिन कस अंजोर हावय रात मÓ
सरकारी विभागों को बिजली का झटका-विजय मिश्रा
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