उर्मिला फाउंडेशन की अनूठी पहल, स्वदेशी अपनाने के साथ कुम्हारों के घर भी रोशन करने का संदेश

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चाइनीज लाइटों की चकाचौंध में कहीं खो न जाए मिट्टी के दीयों की रोशनी: नम्रता सिंह

रायपुर। दीपावली यानी रोशनी, खुशियां और अपनों के साथ उत्सव मनाने का पर्व। बाजारों में इन दिनों रंग-बिरंगी चाइनीज लाइटों की चमक देखते ही बन रही है। आधुनिक सजावट के बीच हर कोई अपने घर को आकर्षक बनाने की तैयारी में जुटा है, लेकिन इस चकाचौंध के बीच एक सवाल भी उठता है कि क्या हम अपनी सदियों पुरानी परंपरा और उन मेहनतकश हाथों को भूलते जा रहे हैं, जिनकी मिट्टी से दीपावली की असली पहचान बनी है?

कभी दीपावली की कल्पना मिट्टी के दीयों के बिना अधूरी हुआ करती थी। घरों की चौखट से लेकर मंदिरों और आंगन तक मिट्टी के दीपों की कतारें सजती थीं। आज इलेक्ट्रॉनिक झालरों और विदेशी लाइटों ने भले ही बाजार में अपनी जगह बना ली हो, लेकिन मिट्टी के दीये की सादगी, उसकी पवित्रता और उससे जुड़ी भावनाओं का कोई विकल्प नहीं हो सकता।

एक दीया खरीदेगा तो किसी कुम्हार के घर भी जलेगा चूल्हा
दीपावली के इस पावन अवसर पर हमें उन कुम्हार परिवारों के बारे में भी सोचना चाहिए, जिनकी कई पीढ़ियां मिट्टी के दीये बनाने में अपना जीवन समर्पित करती आई हैं। महीनों की मेहनत, कलात्मक हुनर और उम्मीदों के साथ वे हजारों दीये तैयार करते हैं। लेकिन जब बाजार में विदेशी सजावटी उत्पादों को अधिक प्राथमिकता मिलती है, तो उनकी मेहनत और उम्मीदों पर भी असर पड़ता है।

हम शायद यह भूल जाते हैं कि बाजार से खरीदा गया एक छोटा-सा मिट्टी का दीया किसी कुम्हार के परिवार के लिए बड़ी खुशी का कारण बन सकता है। हमारी छोटी-सी खरीदारी किसी के रोजगार का सहारा बन सकती है। इसलिए इस दीपावली संकल्प लें कि घर की सजावट के साथ-साथ उन हाथों की मेहनत का सम्मान भी करेंगे, जो हमारी परंपराओं को जीवित रखे हुये है।

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उर्मिला फाउंडेशन ने जगाई स्वदेशी की अलख –
इसी सामाजिक सरोकार और सकारात्मक सोच को आगे बढ़ाते हुए उर्मिला फाउंडेशन की डायरेक्टर नम्रता सिंह की पहल पर मिट्टी के दीयों का वितरण किया जा रहा है। इस पहल का उद्देश्य लोगों को स्वदेशी उत्पाद अपनाने, स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित करने और भारतीय संस्कृति की पारंपरिक पहचान को सहेजने के लिए प्रेरित करना है।

यह पहल केवल दीये बांटने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश देने का प्रयास है कि त्योहारों की खुशियां तभी सार्थक हैं, जब उनका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए जरूरी है कि हम स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दें। इससे न केवल छोटे व्यवसायों को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पारंपरिक हुनर और रोजगार के अवसर भी सुरक्षित रहेंगे।

इस दीपावली एक संकल्प स्वदेशी के नाम-
आज समय की मांग है कि हम आधुनिकता को अपनाएं, लेकिन अपनी संस्कृति और परंपराओं की कीमत पर नहीं। चाइनीज लाइटें कुछ समय के लिए घर को जगमगा सकती हैं, लेकिन मिट्टी का दीया हमारे संस्कार, संस्कृति और आत्मनिर्भर भारत की भावना को भी रोशन करता है।

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उर्मिला फाउंडेशन की यह पहल समाज के प्रत्येक व्यक्ति से अपील करती है कि इस दीपावली मिट्टी के दीये खरीदें, स्थानीय कुम्हारों का सहयोग करें और स्वदेशी उत्पादों को अपनाकर देश की आर्थिक मजबूती में अपनी भागीदारी निभाएं।

याद रखिए, दीपावली की असली रोशनी सिर्फ हमारे घरों में नहीं, बल्कि उन परिवारों के चेहरों पर भी दिखनी चाहिए, जिनकी मेहनत से हमारा त्योहार रोशन होता है। इस बार दीया ऐसा जलाएं, जिसकी रोशनी से भारतीय संस्कृति भी चमके और किसी कुम्हार के घर में भी खुशियों का उजाला फैले।