छत्तीसगढ़ में दो शक्तियों का अनोखा संगम: एक में सूर्योदय तो दूसरे में सूर्यास्त का नजारा

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रायपुर। छत्तीसगढ़ के देवी मंदिरों की महिमा अद्भुत और निराली है। कई रोचक धार्मिक मान्यतायें और कहानियां हैं, जिसे सुनकर आप दंग रह जायेंगे। सोच में पड़ जायेंगे कि क्या ऐसा भी होता है। रायपुर के पुरानी बस्ती में एक ऐसा देवी मंदिर है, जहां एक ही परिसर में दो देवियां आमने-सामने विपरीत दिशा में स्थापित हैं। यहां पर जब सूर्योदय होता है तब सूर्य की पहली किरण माता समलेश्वरी देवी के चरणों को नमन करती हैं। इसके बाद जब सूर्यास्त होता है तो सूरज की डूबती किरणें मां महामाया के चरणों में अर्पित कर सलामी लेती है। भक्त इसे मातारानी का चमत्कार मानते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण की बड़ी बहन हैं योगमाया:
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से पहले मां योगमाया ने जन्म लिया था। वासुदेव ने आधी रात नवजात श्रीकृष्ण को मथुरा से गोकुल ले जाकर नंदबाबा के यहां पैदा हुई कन्या को लेकर लौटे थे। उस कन्या को कंस के मारे जाने की कोशिश के दौरान आकाशवाणी हुई थी कि कंस के काल ने अवतार ले लिया है। वही कन्या योगमाया थी, जिसे रायपुर इस भव्य देवी मंदिर में मां महामाया के नाम से जाना जाता है।

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दूसरी देवी हैं मां समलेश्वरी:
पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि मंदिर में महामाया देवी के विपरीत दिशा में मां समलेश्वरी देवी हैं। सबके प्रति समता भाव रखने वाली समलेश्वरी देवी को देवी सरस्वती के रूप में पूजते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर प्रवेश करते ही दायीं ओर है। श्रद्धालुओं में मान्यता है कि दोनों देवियों की कृपा पुरानी बस्ती इलाके के लोगों पर सदैव रहती है। नवरात्रि के अलावा आम दिनों में भी दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

सैकड़ों साल से जल रही अखंड जोत:
मान्यता है कि मंदिर के गर्भगृह में सैकड़ों साल से अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित हो रही है। इस मंदिर के संस्थापक
राजा मोरध्वज के समय से यह अखंड ज्योति प्रज्ज्वलित हो रही है। सैकड़ों साल से प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति के साथ ही साल में चार बार महाज्योति भी प्रज्ज्वलित की जाती है। इनमें दो गुप्त नवरात्र में आषाढ़ और माघ। वहीं दो सामान्य नवरात्र चैत्र और आश्विन महीने में महाज्योति प्रज्ज्वलित होती है।

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गर्भगृह में तिरछी दिखती है मां महामाया की मूर्ति:
मां महामाया देवी मंदिर में माता की मूर्ति थोड़ी सी तिरछी दिखती है। इसका कारण यह बताया जाता है कि कल्चुरि वंश के राजा मोरध्वज, मां के स्वप्न में दिए आदेश पर खारुन नदी से प्रतिमा को सिर पर उठाकर पैदल चले। जब थक गए तो प्रतिमा को एक शिला पर रख दिया। रखते समय प्रतिमा थोड़ी तिरछी हो गई। इसके बाद लाख कोशिश की गई, लेकिन प्रतिमा उस जगह से नहीं हिली। यही वजह है कि प्रतिमा तिरछी दिखाई देती है।

माचिस से नहीं, चकमक पत्थर से जलती है ज्योत:
यहां महाज्योति को माचिस की तीली से प्रज्ज्वलित नहीं करते बल्कि चकमक पत्थर को रगड़कर निकलने वाली चिंगारी से प्रज्ज्वलित की जाती है।

राजा मोरध्वज ने कराया था मंदिर का निर्माण:
महामाया मंदिर की स्थापना राजा मोरध्वज ने कराया था। हैहयवंशी राजाओं ने छत्तीसगढ़ में 36 किला (गढ़) बनवाया था। हर किले में मां महामाया का मंदिर भी बनवाया था। प्राचीन काल में राजा मोरध्वज के बनवाए गए मंदिर का भोसला राजवंशीय सामंतों ने नवनिर्माण करवाया।

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