अविस्मरणीय रहेंगे ‘नाना’…:गिरीश पंकज

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सामाजिक विसंगतियों पर ‘प्रहार’ और ‘अंकुश’ लगा कर ‘तिरंगा’ फहराने वाला फिल्मों का ‘क्रांतिवीर’- ‘परिंदा’ अब उस पार बहुत दूर चला गया है, लेकिन वह अविस्मरणीय ही रहेगा। नाना पाटेकर एक सफल कलाकार के साथ-साथ एक बेहतर मनुष्य भी थे, जिनके हृदय में गरीबों के प्रति करुणा की भावना थी। इसमें दो राय नहीं कि नाना पाटेकर में देशभक्ति थी इसलिए कारजिल युद्ध के समय वे लंबे समय तक सैनिकों के बीच में रहे। जब मराठवाड़ा और विदर्भ के किसान गंभीर सूखे और कर्ज संकट से जूझ रहे थे, तब उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 2015 में “नाम फाउंडेशन” की स्थापना की। उन्होंने न केवल व्यक्तिगत रूप से आर्थिक सहायता दी, बल्कि गांवों में जल संरक्षण, चेक डैम निर्माण और सूखाग्रस्त परिवारों के पुनर्वास में ठोस जमीनी काम किया। फिल्म प्रहार (1991) के दौरान उन्होंने वास्तविक मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ कठिन सैन्य प्रशिक्षण लिया था। उन्हें भारतीय प्रादेशिक सेना में मानद कैप्टन का पद भी मिला। 1999 के कारजिल युद्ध के दौरान वे कई हफ्तों तक अग्रिम चौकियों पर जवानों के साथ रहे और उनका मनोबल बढ़ाया। बॉलीवुड की ग्लैमरस जीवनशैली और व्यावसायिक होड़ के उलट, वे पुणे के पास खडकवासला में अपने फार्महाउस पर सादा जीवन बिताना, खुद खेती करना और जरूरत पड़ने पर आम लोगों की तरह समय बिताना पसंद करते थे। फिल्म उद्योग में व्यावसायिक निवेश अपनी जगह है, लेकिन समाज से मिले प्यार और दौलत को जरूरतमंदों की भलाई में लौटाने की जो मिसाल नाना पाटेकर ने पेश की, वह वास्तव में प्रेरणादायक है। मैंने उनके ‘नाम’ फाउंडेशन के बारे में पढ़ा है कि उसने मराठवाड़ा और विदर्भ की मौसमी नदियां, नालों और नहरों से गाद निकालकर गहरा और चौड़ा किया। सैकड़ों गांवों में चेक डैम, सीमेंट नाला बांध और खेत तालाबों का निर्माण कराया, जिससे वर्षा जल बहने के बजाय जमीन के भीतर समाया और कुओं व बोरवेल का जलस्तर सुधरा। जलस्रोतों से निकाली गई उपजाऊ गाद को सीधे किसानों के खेतों में डाला गया, जिससे जमीन की पैदावार क्षमता बढ़ी। आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवारों को सीधे वित्तीय मदद देकर उन्हें तात्कालिक कर्ज और भरण-पोषण के संकट से उबारा। प्रभावित परिवारों की विधवाओं को सिलाई मशीनें, आटा चक्की और छोटे कुटीर उद्योग स्थापित करने के साधन मुहैया कराए, ताकि वे सम्मानपूर्वक आजीविका चला सकें। पीड़ित परिवारों के बच्चों की स्कूली और व्यावसायिक शिक्षा का खर्च वहन किया गया। पर्यावरण संतुलन और भूजल संवर्धन के लिए बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान चलाए गए। किसानों को पारंपरिक जल-गहन फसलों के बजाय ड्रिप सिंचाई और जलवायु-अनुकूल फसलों के उपयोग के लिए जागरूक किया गया। सूखाग्रस्त क्षेत्रों के कई गांवों को गोद लेकर वहां पेयजल, स्वच्छता, सौर ऊर्जा और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं तैयार की गईं। इन पहलों में सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें ‘श्रमदान’ के जरिए ग्रामीणों को सीधे जोड़ा गया, जिससे लोगों में अपने गांव के विकास के प्रति अपनत्व की भावना जागी। नाम फाउंडेशन की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता और जनसहभागिता रही, जिसके चलते देश-विदेश के आम नागरिकों ने इसमें खुलकर योगदान दिया। आज नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन फिल्मों में उन्होंने जो अप्रतिम अभिनय किया और साथ ही फाउंडेशन बनाकर जो उत्कृष्ट कार्य किया, उसके कारण उनका नाम हमेशा के लिए अमर हो गया है। बॉलीवुड के अनेक कलाकार करोड़ों रुपए कमा कर उन पैसों का व्यावसायिक इस्तेमाल कर रहे हैं। कोई होटल बनवा रहा है तो कोई कुछ और। इस सबकी कोई ऐसी खबर नहीं आती कि वे कोई सामाजिक काम कर रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि नाना पाटेकर जैसे कलाकारों से विवेक कुछ सबक लेकर कुछ बेहतर काम करेंगे।