धर्म में राजनीति का प्रवेश नहीं, राजनीति में धर्म का होना जरूरी
गौ माता को राजमाता का दर्जा देने की मांग
रायपुर। अंतर्राष्ट्रीय कथावाचक इंद्रेश महाराज ने कहा है कि राजनीति में धर्म का होना जरूरी है, लेकिन धर्म में राजनीति का प्रवेश नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीति धर्म के मूल्यों के बिना नहीं चल सकती, लेकिन धर्म को राजनीतिक स्वार्थ से दूर रखा जाना चाहिए। उनके अनुसार सत्ता प्राप्त करने के लिए धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल उचित नहीं है। इंद्रेश महाराज शुक्रवार को रायपुर प्रेस क्लब के ‘हमर पहुना’ कार्यक्रम में पहुंचे थे। इस दौरान प्रेस क्लब अध्यक्ष मोहन तिवारी एवं पदाधिकारियों ने उनका स्वागत किया।
कार्यक्रम में इंद्रेश महाराज ने पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि
गौ माता को ‘राजमाता’ का दर्जा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिसको हम मां मानते हैं, उसके सम्मान के लिए भी पहल करनी पड़ रही है, यह चिंता का विषय है। उन्होंने गौ संरक्षण को भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपरा से जोड़ते हुए कहा कि गौवंश की रक्षा समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि हमारे देश में चमत्कार की परंपरा पुरानी रही है। उन्होंने नीम करोली बाबा और धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके प्रति श्रद्धालुओं की आस्था है और वे लोगों की समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान के प्रयास के लिए जाने जाते हैं।
बारिश में भी कथा सुनने पहुंच रहे श्रद्धालु
इंद्रेश महाराज ने रायपुर के श्रद्धालुओं की भी जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि पिछले दो दिनों से लगातार बारिश होने के बावजूद श्रद्धालु कथा स्थल पर घंटों पहले पहुंचकर कीर्तन करते हुए बैठ रहे हैं। उन्होंने कहा कि इतनी बारिश में सामान्य व्यक्ति कहीं जाने से पहले कई बार सोचता है, लेकिन श्रद्धालुओं की कथा के प्रति आस्था और उत्साह देखते ही बनता है।
कथा आयोजन की व्यवस्था की सराहना
देवेंद्रनगर में चल रही कथा के आयोजनकर्ताओं की व्यवस्थाओं की तारीफ करते हुए महाराज ने कहा कि कथा स्थल पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा रहा है। जो पहले आता है, वह आगे बैठकर कथा श्रवण कर सकता है। उन्होंने इसे ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की व्यवस्था बताते हुए कहा कि यहां किसी के लिए अलग व्यवस्था नहीं है।
कथा में कोई वीआईपी व्यवस्था नहीं
महाराज ने कहा कि कथा में कोई वीआईपी सिस्टम नहीं रखा गया है। सभी श्रद्धालुओं को समान रूप से बैठकर कथा सुनने का अवसर मिलता है। उन्होंने मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी के कथा में आने का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने भी सामान्य श्रद्धालुओं के बीच नीचे बैठकर करीब तीन घंटे तक कथा सुनी और बिना किसी विशेष व्यवस्था के वापस चली गईं।
गृहस्थ जीवन में आध्यात्म जरूरी
गृहस्थ जीवन और आध्यात्मिक जीवन के बीच संतुलन को लेकर पूछे गए सवाल पर महाराज ने अपने चुटीले अंदाज में कहा कि संतुलन बनाना आसान नहीं है, लेकिन प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पत्नी भी उनके कार्य और कथा के उद्देश्य को समझती हैं। दोनों आध्यात्मिक विचारों को समझते हुए मिलकर रास्ता निकालते हैं। गृहस्थ जीवन में आध्यात्म को शामिल करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि सन्यासी संसार के मोह से विरक्त हो चुके होते हैं, जबकि भगवद्गीता और रामायण जैसे ग्रंथ गृहस्थ जीवन जीने वाले लोगों के लिए भी मार्गदर्शन देते हैं। संसार में रहते हुए व्यक्ति इन ग्रंथों के माध्यम से अपने जीवन को आध्यात्म से जोड़ सकता है।
निस्वार्थ भाव से करें भगवान की पूजा
महाराज ने कहा कि आज लोग भगवान की पूजा भी अक्सर अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए करते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान सबके मन की बात जानते हैं, लेकिन पूजा-पाठ में केवल अपनी इच्छाएं रखने के बजाय कभी निस्वार्थ भाव से भगवान को याद कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रखर विचारक और समाज सुधारक थे : उपराष्ट्रपति
घोर कलियुग में प्राण सोशल मीडिया में चले गए
सोशल मीडिया के प्रभाव पर महाराज ने युगों का उदाहरण देते हुए कहा कि सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग में मनुष्य के जीवन और शरीर को लेकर अलग-अलग मान्यताएं रही हैं। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि घोर कलियुग में मानो मनुष्य के प्राण सोशल मीडिया में चले गए हैं। आज मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी होने पर व्यक्ति स्वयं को असहाय महसूस करने लगता है। उन्होंने मोबाइल और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जताते हुए इसके संतुलित उपयोग की बात कही।
वीआईपी दर्शन पर जताई आपत्ति
मंदिरों में वीआईपी दर्शन को लेकर महाराज ने कहा कि बड़े मंदिरों में मंदिर के रखरखाव, भोग और वहां से जुड़े लोगों की व्यवस्थाओं के लिए आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। लेकिन केवल दर्शन के नाम पर अत्यधिक पैसा लेकर विशेष सुविधा देना उचित नहीं है। उन्होंने तिरुपति बालाजी का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी वीआईपी व्यवस्था में समय लग सकता है।
जेन-जी को राष्ट्र निर्माण में योगदान की सलाह
जेन-जी के संबंध में महाराज ने कहा कि जो लोग प्रभावशाली और शक्तिशाली होते हैं, वे अक्सर विवादों में भी आ जाते हैं। उन्होंने युवाओं से अपने प्रभाव और शक्ति का गलत इस्तेमाल नहीं करने की अपील की। उन्होंने कहा कि युवा अपनी ऊर्जा और क्षमता को राष्ट्र निर्माण और सकारात्मक कार्यों में लगाएं।


