मित्रों की पहचान-डॉ.माणिक विश्वकर्मा

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सच्चे और भरोसेमंद मित्रों की पहचान उनके संकट के समय साथ देने, बुरी आदतों से सचेत करने, बिना स्वार्थ भलाई करने एवं पीठ पीछे बुराई न करने जैसे गुणों से की जाती है। पीठ पीछे बुराई करने, कमियाँ तलाशने, नीचा दिखाने , तरक्की देख चिढऩे वाले और मजाक उड़ाने वाले मतलबी प्रवृत्ति के लोग कभी किसी के अच्छे मित्र नहीं बन पाते। ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए।स्वार्थी मित्रों की पहचान यदि समय रहते न कर पाए तो उसका खामियाजा किसी न किसी रूप में ज़रूर भुगतना पड़ता है। ऐसे लोग सिफऱ् काम के वक़्त आसपास मँडराने, अपने फायदे के लिए तारीफ़ों के पुल बाँधने, दुख या संकट के समय बहाना करके दूर-दूर तक नजऱ न आने एवं कृतज्ञता व्यक्त न करने के आदी होते हैं। स्वार्थी किस्म के तथाकथित मित्र प्राय: अपना उल्लू सीधा करने एवं बातें बनाने में माहिर होते है तथा सदैव आत्ममुग्धता में लीन रहते हैं। अपने लाभ के लिए किसी से भी आसानी से दोस्ती कर लेते हैं। जबकि सच्चे मित्र बौद्धिक रूप से इतने सम्पन्न होते हैं कि उन्हें अपने मित्र के सुख-दुख, पसंद- नापसंद एवं ज़रूरतों का पूरा ध्यान रहता है। बिना बोले संकट के समय हाजिऱ हो जाते है जबकि मतलबी एवं हृदयहीन लोग प्राय: दूर भाग जाया करते हैं। दूसरों के समय और ऊर्जा का अनादर करके गुप्त प्रतिस्पर्धा की भावना से उन्हें पीछे ढकेलने का मरसक प्रयास करते हैं।स्वार्थी मित्रों की सबसे बड़ी पहचान होती है वक्त आने पर गधे को भी बाप बना लेना और वक्त निकलने पर बाप को भी गधा कहने से न कतराना । अत्यधिक मीठी जबान एवं झूठे दिखावटी प्रेम-व्यवहार में कोई कसर न छोडऩा। उन बातों की भी प्रशंसा करना जो प्रशंसा के लायक न हो। एक अच्छ और सच्चे मित्र का होना सौ स्वार्थी मित्रों के होने से अच्छा माना जाता है क्योंकि एक सच्चे मित्र की मिठास उसके ईमानदार प्रेम, व्यवहार, उचित सलाह एवं सहयोग की भावना में छिपी रहती है। वह गपशप नहीं करता। उसकी दृष्टि हमेशा अपने मित्र की कमियों को सुधारने में एवं खूबियों को उज़ागर में टिकी रहती है।एक अच्छा मित्र सगे भाई से अधिक करीबी होता है। इसीलिए कहा भी गया है कि जहाँ तक हो सके बुद्धिमानों से मित्रता करनी चाहिए, मूर्खों से मित्रता एक न एक दिन हानि का दुख का कारण बन जाती है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के लिखा है कि धीरज धर्म मित्र अरु नारी आपद काल परखिए चारी। अर्थात विपत्ति या संकट के समय ही धैर्य,धर्म, सच्चे मित्र एवं पत्नी की असली परख होती है। वरना आजकल के मित्रों के संदर्भ में बकौल नवरंग ये कहना सटीक बैठता है कि -व्यक्तित्व आदमी का कितना विचित्र है, करता भी भीतरघात और बनता मित्र है। मन को किसी के पढऩा असंभव है इनदिनों, उजला है जिस्म स्वर्ण सा मैला चरित्र है।