बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण वाला फैसला सुनाते हुए डकैती और आपराधिक साजिश के मामले में सजा काट रहे एक कैदी को अपनी बहन की विदाई समारोह में शामिल होने की अनुमति दी है। हालांकि अदालत ने अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया, लेकिन पुलिस अभिरक्षा में आठ घंटे के लिए समारोह में शामिल होने की अनुमति प्रदान की। यह आदेश बिलासपुर हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति राधाकिशन अग्रवाल की एकलपीठ ने पारित किया। मामला भिलाई के सुपेला थाना क्षेत्र स्थित कृष्णानगर निवासी 29 वर्षीय मनीष बंसोर से जुड़ा है। मनीष को दुर्ग की विशेष अदालत ने 18 नवंबर 2025 को डकैती और आपराधिक साजिश के मामले में दोषी ठहराया था। अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी के तहत सात वर्ष और धारा 397 के तहत दस वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। वर्तमान में वह जेल में बंद है और अपनी सजा काट रहा है।
मनीष की ओर से अधिवक्ता आदित्य भारद्वाज ने हाईकोर्ट में अंतरिम जमानत याचिका दायर की। याचिका में बताया गया कि उसकी सगी बहन का विवाह 29 जून 2026 को भिलाई के उमरपोटी, धनोरा रोड स्थित राधे-राधे पैलेस में संपन्न हुआ है और 30 जून को उसकी विदाई होनी है। परिवार में मनीष ही एकमात्र भाई है, इसलिए बहन की विदाई से जुड़ी पारंपरिक और सामाजिक रस्में निभाने के लिए उसका उपस्थित रहना आवश्यक है। इसी आधार पर कुछ दिनों की अंतरिम जमानत देने की मांग की गई। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से पैनल अधिवक्ता ऋषिकेश शर्मा ने अंतरिम जमानत का विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि मनीष गंभीर अपराध में दोषसिद्ध सजायाफ्ता कैदी है और उसे खुली अंतरिम जमानत देना सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं होगा। हालांकि उन्होंने मानवीय पहलू को स्वीकार करते हुए सुझाव दिया कि यदि अदालत उचित समझे तो आरोपी को पुलिस अभिरक्षा में सीमित समय के लिए समारोह में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने संतुलित रुख अपनाया। अदालत ने अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
लेकिन सामाजिक और पारिवारिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए मनीष बंसोर को पुलिस कस्टडी में बहन की विदाई में शामिल होने की अनुमति दे दी। हाईकोर्ट ने केंद्रीय जेल अधीक्षक और दुर्ग पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करते हुए मनीष को 30 जून 2026 को सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक पुलिस अभिरक्षा में विवाह स्थल ले जाएं। इस दौरान वह अपनी बहन की विदाई से जुड़ी रस्में पूरी कर सकेगा। निर्धारित समय समाप्त होने के बाद शाम 5 बजे उसे तत्काल वापस जेल पहुंचाया जाएगा। सुनवाई के दौरान एक तकनीकी त्रुटि भी सामने आई। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि आवेदन तैयार करते समय जल्दबाजी में टाइपिंग की गलती हो गई थी, जिसके कारण मनीष बंसोर के स्थान पर बन्नूराम सिन्हा” का नाम दर्ज हो गया था।
अदालत ने इस त्रुटि को स्वीकार करते हुए आवेदन में संशोधन की अनुमति भी प्रदान कर दी। इस फैसले को मानवीय संवेदनाओं और कानूनी संतुलन का उदाहरण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर अपराध में दोषसिद्ध होने के बावजूद सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों की अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन इसके लिए सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से कोई समझौता भी नहीं होना चाहिए। इसी कारण अदालत ने अंतरिम जमानत के बजाय पुलिस सुरक्षा में सीमित समय के लिए समारोह में शामिल होने की अनुमति दी।
