धरा को हरा बनाते पीले सूखे पत्ते-विजय मिश्रा

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विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून पर हर ओर वृक्षारोपण करने, पर्यावरण पर संगोष्ठी, पौधों का वितरण जैसे ना जाने कितने कार्यक्रमों की बाढ़ आ गई थी। समाज सेवक होने के नाते मैं भी दिनभर पर्यावरण संरक्षण के कार्यक्रमों में लगा हुआ था। थका हारा रात को लौटा तो गहरी नींद में चला गया था। टन-टन-टन की आवाज से घण्टा घर ने रात के तीन बजने की सूचना दी। मेरी नींद टूट गई थी, दोबारा सोने की कोशिश को गरमी ने नाकाम कर दिया। तभी किसी के रोने सिसकने की आवाज सुनाई दी। रोने की आवाज से बेचैन मन लिए मैं उस दिशा में चल पड़ा,जहॉ से रोने की आवाज आ रही थी। घर के पीछे बगीचे में पहुंचा तो वहॉ पड़े सूखे पत्तों पर मेरे पैर पड़ते थे,तब चर्र-चर्र चर्र-चर्र की आवाज आती थी। मुझे लगा मानों सूखे पत्ते ही रो रहे है। मैंने एक पत्ते को उठाते हुए पूूछा- क्यों रो रहे हो पत्ता भाई? सूखे पत्ते ने आहें भरते हुए कहा- हमारे हिस्से में तो अब रोना ही बचा है। बड़ी पुरानी कहावत है ‘सबका पकना अच्छा लगता है,पर पत्तों का पकना उनके पतन का सूचक होता हैÓ। हरे पत्ते पीले होकर गिरते हैं, तो इन्हें कचरा जैसे जला दिया जाता है।ऐसा करने वाले लोग नासमझी का परिचय देते हुए खुद के पॉव पर कुल्हाड़ी मारते हैं। पत्ते के बहुपयोगी होने से अनजान होते हैं। पत्ते से मैंने जिज्ञासावश पूछा – पत्ते भला कैसे बहुपयोगी होते हैं? मेरे इस प्रश्न पर वह बोला – पेड़ पौधों का नाता जन्म से मानव से जुड़ा होता है। उनके फल, फूल, पत्तों और डगालियों का उपयोग अनादिकाल से मानव करता आया है। पत्तों का उपयोग औषधी,कच्ची मिटटी के घरों में छावन, पत्तल-दोना,खिलौना, झाडू जैसे अनगिनत कामों में होता है। पत्ता भाई, पत्ते पीले पड़कर क्यों गिर जाते हैं? इस सवाल पर पत्ते ने कहा- हरे पत्तों में हरित पर्ण (क्लोरोफील) नामक एक पदार्थ होता है,जो कि पौधों के लिए भोजन बनाने का काम करते हुए प्राणवायु आक्सीजन का उत्सर्जन करता है। हरित पर्ण की समाप्ति पर ही पत्ते पीले पड़कर सूखकर गिर जाते हैं। ऐसे सूखे पत्तों में भी प्रोटीन विटामीन,नाइट्रोजन आदि बहुमूल्य तत्वों की उपस्थिति बनी होती है। यही वजह है कि सूखे पत्ते सड़ कर ”कम्पोस्ट खादÓÓ बन जाते हैं, जो कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं। पौधों को मजबूती देते हैं। आगे पत्ते ने बताया कि सूखे पत्तों की सुरक्षा के लिए नेशनल ग्रिन ट्रिब्यूनल (हरित न्यायाधीकरण) ने कड़े कानून भी बनाये हैं। जन जागरूकता के अभाव में लोग पेड़-पौधों की कटाई करत हैं। जंगलों में और सूखे पत्तों में आग लगा देते हैं।इससे जीव जंतु,जलकर मर जाते हैं,उनका वंश नाश हो जाता है। अनेक जंतुओं की स्थिति इसलिए लुप्तप्राय भी हो चली है। सूखे पत्तों को जलाने से विषैली गैस निकलती है।इससे वातावरण की नमी का भी नाश होता है। पत्ते से बातचीत करते हुए मुझे एक और इंसानी भूल का अहसास हुआ कि वन भ्रमण, पर्यटन भ्रमण के दौरान जलती हुई बीड़ी,सिगरेट फेंक देते हैं अथवा जलाये गये चूल्हे को बिना बुझाये छोड़ देते हैं, जिससे जंगलों में भयानक आग लग जाती है। अपनी बात को समाप्त करते हुए मैंने कहा- आज के बाद अपने साथियों को भी यह सिखाता रहूंगा कि पालिथीन के उपयोग,कल कारखानों से उत्सर्जित धूल धूवां, अपशिष्ट पदार्थों पर नियंत्रण अथवा पेड़ पौधे लगाने भर से पर्यावरण संरक्षित नहीं होगा बल्कि पेड़ पौधों से गिरे पत्तों को बचाने, उन्हें नहीं जलाने में भी समझदारी है। तभी तो किसी ने क्या खूब लिखा है-
नीचे गिरे सूखे पत्तों पर अदब से चलना जरा,
कभी कड़ी धूप में तुमने इनसे ही पनाह मांगी थी।