महंगाई यूं तो सामान्य आय वर्ग के लोगों को डंक मारती ही रहती है, लेकिन इस बार एकदम से उसका रौद्र रूप देखने को मिला है। देश में थोक मूल्य सूचकांक यानि डब्ल्यूपीआई आधारित महंगाई अप्रैल में बढकऱ 8.3 प्रतिशत हो गई जो मार्च में 3.88 प्रतिशत थी। यह पिछले 42 महीनों का उच्चतम स्तर है। और ये तो आंकड़ों का खेल है, सच में महंगाई की मार इन आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा कल जारी आंकड़े थोक महंगाई दिखा रहे हैं, रिटेल महंगाई इससे ज्यादा होती है। पश्चिम एशिया संकट के कारण ईंधन एवं बिजली की कीमतों में भारी वृद्धि इसकी मुख्य वजह बताई जा रही है। अर्थशास्त्री इसे युद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव का पहला संकेत बताया। वे कह रहे हैं कि ये आंकड़े खुदरा स्तर पर कीमतें बढ़ाने के लिए सरकार पर पडऩे वाले दबाव को भी दर्शाते हैं। अप्रैल का यह आंकड़ा अक्टूबर 2022 में 8.67 फीसदी पर पहुंचे थोक महंगाई के बाद सबसे अधिक है। उस समय कोविड का दंश लोगों ने झेला था। पश्चिम एशिया संकट के दूसरे पूरे महीने में ईंधन श्रेणी की महंगाई 24.71 प्रतिशत रही जबकि पिछले महीने यह 1.05 फीसदी थी। अप्रैल का आंकड़ा अक्टूबर 2022 के बाद 42 महीनों में सबसे अधिक है, उस समय यह 25.4 प्रतिशत था। इस श्रेणी की सभी वस्तुओं में दो अंकों की महंगाई दर्ज की गई। एलपीजी में 10.92 प्रतिशत, पेट्रोल में 32.40 प्रतिशत और डीजल में 25.19 प्रतिशत की महंगाई देखी गई। अर्थशास्त्र की भाषा में सूचकांक में 64 फीसदी से अधिक भारांश वाले विनिर्मित उत्पादों में महंगाई अप्रैल में 4.62 फीसदी तक बढ़ गई जो मार्च में 3.39 फीसदी थी। पिछली बार सितंबर 2022 में महंगाई 6.12 प्रतिशत पर अप्रैल के स्तर के पार पहुंची थी। इसके अलावा, खाद्य उत्पादों में 2.9 प्रतिशत, वनस्पति एवं पशु तेल व वसा में 4.43 प्रतिशत, कपड़ा में 7.3 प्रतिशत, रसायन एवं रासायनिक उत्पाद में 5.09 फीसदी और बुनियादी धातुओं 7 प्रतिशत की वृद्धि पिछले महीने के मुकाबले अप्रैल में देखी गई। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के अनुसार धातुओं की ऊंची वैश्विक कीमतों, अल नीनो के प्रभाव की आशंका और आयात की भारी लागत के कारण आगामी महीनों के दौरान विनिर्माण क्षेत्र की महंगाई में तेजी बनी रह सकती है। आंकड़ों से पता चलता है कि प्राथमिक खाद्य पदार्थों में 1.98 फीसदी की महंगाई दर्ज की गई जो मार्च में 1.9 फीसदी थी। इधर, गैर-खाद्य श्रेणी में महंगाई 11.5 फीसदी से बढकऱ 12.18 फीसदी हो गई। केयरएज रेटिंग्स के अनुसार इस साल अल नीनो के प्रभाव की आशंका खाद्य महंगाई के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस श्रेणी में इस महीने महंगाई 67.18 प्रतिशत तक पहुंच गई। कच्चे पेट्रोलियम की कीमतों में 88.06 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके साथ ही उम्मीद की जा रही है कि आरबीआई नीतिगत दरों पर यथास्थिति बनाए रखेगा। तमाम परिस्थितियों के चलते ही रुपया कल 15 मई को डॉलर के मुकाबले 50 पैसे गिरकर पहली बार 96.14 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया था, इससे पहले गुरुवार को रुपया 95.64 के ऑल टाइम लो पर पहुंचा था। पिछले कुछ दिनों से रुपए में लगातार गिरावट जारी है। इस साल की शुरुआत से ही रुपया दबाव में है। पिछले साल दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 90 के स्तर के पार गया था। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और जियोपॉलिटिकल तनाव कम नहीं हुआ, तो रुपया जल्द ही 100 के स्तर को भी छू सकता है। एक दौर ऐसा भी रहा है कि वर्तमान सत्ता में बैठे लोग रुपए की गिरावट पर कहा करते थे कि जब रुपया गिरता है तो देश की इज्जत भी गिरती है। आज जब वो सत्ता में हैं, तो रुपए की गिरावट पुराने दौर के मुकाबले बहुत ज्यादा हो गई है। रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही है। इसके पीछे पश्चिम एशिया संकट बताया जा रहा है। हालांकि इस तरह के संकट पहले भी आते रहे, लेकिन तब विपक्ष के तौर पर यही लोग कारणों को मानने के बजाय इसे सत्ता की बड़ी विफलता माना करते थे। खैर, ये तो राजनीति है। लेकिन महंगाई की मार आम आदमी पर जिस तरह से पड़ रही है, वो कराह भी नहीं पा रहा है। सीधे आत्महत्या करने की कगार पर पहुंच रहा है। परिस्थितियों से मुकाबला करना सरकार की जिम्मेदारी है, इसे सीधे नागरिकों पर थोपना उसकी नाकामी ही कही जाएगी।
महंगाई का रौद्र रूप – संजय सक्सेना
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