Bhooth Bangla Review: ‘भूल भुलैया’ के बाद फिर लौटे अक्षय कुमार, जानें इस बार कितना डराया और कितना हंसाया?

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मुंबई। प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की जोड़ी के साथ दिक्कत यही है कि आप चाहकर भी उम्मीद कम नहीं रख सकते। फिर चाहे वो, हेरा फेरी, फिर हेरा फेरी, भागम भाग, गरम मसाला, दे दना दन ये सिर्फ फिल्में नहीं हैं, ये एक तरह का बेंचमार्क हैं। और ‘भूत बंगला’ देखते वक्त बार-बार यही लगता है कि फिल्म उस बेंचमार्क तक पहुंचने की कोशिश भी नहीं कर रही, बस उसके आसपास घूम रही है। जी हाँ दरअसल अर्जुन (अक्षय कुमार) लंदन से मंगलपुर अपने पुश्तैनी महल में आता है, बहन मीरा (मिथिला पालकर) की शादी कराने। लोकेशन कोई आम नहीं है। यह वही महल है, जिसके बारे में गांव वाले पहले से कहानियां सुनाते हैं। लेकिन शादी यहीं होगी, क्योंकि होनी है। यहीं से फिल्म आपको टेस्ट करती है। आप मान लेते हैं तो आगे बढ़िए, वरना यहीं अटक जाएंगे। शादी की तैयारियों के साथ-साथ महल भी एक्टिव हो जाता है। अजीब हरकतें, अनचाहे हादसे, रहस्यमय मंदिर… सब कुछ होता है, लेकिन फिल्म इन्हें डराने के लिए नहीं, माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल करती है। वहीं बीच में वामिका गब्बी का किरदार आता है, जो सब जानती भी है और कुछ छुपाती भी है। फिर दूसरे हिस्से में तब्बू आती हैं और कहानी को अतीत से जोड़ने की कोशिश होती है। समस्या यह नहीं है कि कहानी कमजोर है। समस्या यह है कि फिल्म खुद तय नहीं कर पाती कि इसे हल्का रखना है या गंभीर बनाना है। और सबसे बड़ा सवाल यही रह जाता है…’क्या हो रहा है’, यह तो दिखता है लेकिन ‘क्यों हो रहा है’, यह ठीक से समझ नहीं आता।

अक्षय कुमार इस फिल्म को खींचते हैं, धकेलते हैं और कई बार बचाते भी हैं। जहां सीन कमजोर लगता है, वहां वह कुछ न कुछ कर देते हैं। लेकिन सच यह भी है कि यह उनका जाना-पहचाना जोन है। आपको सरप्राइज नहीं मिलता, बस भरोसा मिलता है। राजपाल फिल्म में आते ही बताते हैं कि नैचुरल कॉमेडी क्या होती है। उनके सीन लिखे हुए नहीं लगते, होते हुए लगते हैं। और ईमानदारी से कहें तो, कई बार वही फिल्म को पटरी पर रखते हैं जब बाकी चीजें डगमगाती हैं। वामिका गब्बी अच्छी लगती हैं, सहज भी हैं, लेकिन फिल्म उन्हें ठीक से इस्तेमाल ही नहीं करती। वह कहानी में हैं, लेकिन कहानी उन पर टिकी नहीं है। वहीं तब्बू आती हैं और फिल्म अचानक सीरियस हो जाती है। वह अपने हिस्से को ईमानदारी से निभाती हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें उतना स्पेस नहीं देती कि वह असर छोड़ सकें। परेश रावल और मनोज जोशी जैसे कलाकार हैं, लेकिन इस बार उनके पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। और फिर असरानी…उन्हें देखकर फिल्म थोड़ी देर के लिए बेहतर लगने लगती है। यह उनकी आखिरी फिल्म है और उनके कुछ सीन आपको सच में मुस्कुरा देंगे। शायद इसलिए भी कि उनमें वो पुरानी गर्माहट है, जो बाकी फिल्म में मिसिंग है। प्रियदर्शन यहां पूरी तरह गलत नहीं हैं, लेकिन पूरी तरह सही भी नहीं हैं। कुछ सीन में उनकी पकड़ दिखती है, फिर अचानक सब ढीला पड़ जाता है। फिल्म एक लय नहीं पकड़ती और यही सबसे बड़ी दिक्कत है। यहीं फिल्म हारती है। एक ही तरह का स्लैपस्टिक बार-बार दोहराया जाता है। शुरुआत में हंसी आती है लेकिन फिर बाद में दोहराव लगता है। दूसरे हिस्से में कॉमेडी लगभग गायब हो जाती है और फिल्म सीरियस हो जाती है…लेकिन वहां भी उतनी पकड़ नहीं बनती। डायलॉग ठीक हैं, लेकिन टिकते नहीं…कॉमेडी कई जगह जबरदस्ती बनाई हुई लगती है, अपने आप निकलते हुए नहीं.. और यही वो जगह है जहां पुराने दौर की याद आती है। जब नीरज वीरा जैसे लेखक हालात को इस तरह लिखते थे कि हंसी अपने आप निकलती थी जैसे हेरा फेरी, फिर हेरा फेरी।