बुजुर्गों के अकेलेपन की समस्या वैश्विक रूप धारण कर चुकी है। भारत सहित चीन, जापान, स्वीटजरलैंड, अमेरिका, फ्रांस, कनाडा और ब्रिटेन में बुजुर्गों की स्थिति अकेलेपन के कारण दयनीय हो गई है। जापान तथा स्विट्जरलैंड में इच्छा मृत्यु लेने वालों की संख्या बढ़ गई स्विट्जरलैंड और जापान में तो कई केंद्र ऐसे हैं जिनमें इच्छा मृत्यु धारण करने वाले बुजुर्गों को वहां अलविदा कहकर भेज दिया जाता है। यह स्थिति मानवता के लिए अत्यंत चिंतनीय है। मैंने स्वयं अपनी स्वीटजरलैंड, अमेरिका तथा ब्रिटेन की यात्रा के दौरान देखा है कि वहां के बुजुर्ग वहां के बाग बगीचों में टहलने की बजाय किताब या उपन्यास पढ़ते हैं और वहां कई इच्छा मृत्यु केंद्र (हॉस्पिटल) भी देखे हैं, जहां बुजुर्ग स्त्री-पुरुष स्वयमेंव जाकर भरती होते हैं और इंजेक्शन लगवाकर इच्छा मृत्यु धारण कर लेते हैं। वहां का यह प्रचलन अत्यंत दारुणिक और मार्मिक है। स्विट्जरलैंड और अन्य यूरोपीय देशों की तुलना में भारत में अभी ओल्ड एज होम यानी वृद्ध आश्रम का चलन उस रफ्तार से नहीं बढा है। यूरोपीय देशों में इसका चलन बुजुर्गों के लिए ऐच्छिक बन चुका है। वहां पर लगभग 40 फीसदी बुजुर्गों को ओल्ड एज होम भेज दिया जाता है। भारत के संदर्भ में अभी भी बुजुर्गों को संयुक्त परिवार में काफी वरीयता दी जाती है, किंतु जिन परिवारों में बुजुर्गों की संताने एकल परिवार वाली होती हैं वहां निश्चित तौर पर बुजुर्गों को वृद्ध आश्रम भेजने की तैयारी कर ली जाती है। पहले बुजुर्ग अपने नाती-पोतों के साथ खेल कर उन्हें दादी-नानी की कहानी सुना कर अपना बुढ़ापा गुजार लिया करते थे। किंतु अब छोटे बच्चों को शिक्षा के नाम पर बाहर व्यावसायिक स्कूलों में भेज दिया जाता है, जिससे बुजुर्ग एकदम अकेले हो जाते हैं। संतानों के पास अपनी नौकरियों तथा व्यवसाय के कारण बुजुर्गों से बात करने का समय नहीं होता, नतीजतन बुजुर्ग एकदम अकेले हो जाते हैं और अनेक बीमारियों के शिकार होने लगे हैं। भारत में आधुनिकता की होड़ ने देश के संयुक्त परिवारों को खंडित कर दिया है। अधिकांश परिवार अब एकल परिवार में परिवर्तित हो गए हैं। ऐसे में बुजुर्ग तथा बच्चे सबसे ज्यादा इस त्रासदी के शिकार हुए हैं। आधुनिक जीवन शैली ने माता-पिता को नन्हे बच्चों से दूर कर दिया है और परिवार में स्त्री-पुरुष के नौकरी करने के कारण बच्चे या तो बुजुर्गों के साए में परवरिश के लिए बाध्य हैं अथवा उनकी देखरेख आया के भरोसे निर्भर हो गई है। बुजुर्गों के साथ उनकी संतानों की असंवेदनशीलता ने असहाय सा बना दिया है। बच्चों तथा बुजुर्गों को इसी समय सबसे ज्यादा अपने माता-पिता तथा संतानों के सहयोग एवं संरक्षण की आवश्यकता महसूस होती है। यदि आधुनिक जीवन शैली के कारण बुजुर्गों तथा बच्चों का उनके अभिभावक एवं पुत्रों-पुत्रियों के साथ संवादहीनता एक बड़ी पीड़ा का कारण बन जाती है। भारत में सर्वे के अनुसार बुजुर्गों और नौजवान पीढ़ी के बीच संवादहीनता एक चिंताजनक स्वरूप ले चुका है। बुजुर्ग एकाकीपन से अब मानसिक रोगों के शिकार होने लगे हैं। जिन बुजुर्गों को चलने-फिरने और बाहर जाने में परेशानी होती है, उनके लिए नौजवान पीढ़ी के साथ संवादहीनता परेशानी का एक बड़ा सबक बन चुका है। महिला तथा पुरुष बुजुर्गों के साथ यह समस्या वृहद रूप लेकर सामाजिक समस्या बन गई है। बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं इनका जीवन के हर दृष्टिकोण में संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। इसी तरह बच्चों को नैतिक तथा बुनियादी शिक्षा देकर उन्हें देश का अच्छा नागरिक बनाने की जिम्मेदारी भी माता-पिता पर होती है। पर वर्तमान में बच्चे मां-बाप के नौकरी पेशा होने के कारण उनसे दूर होते जा रहे हैं। बुजुर्ग और संतानों के बीच मोबाइल, व्हाट्सएप फेसबुक और इंटरनेट के कारण संवादहीनता ने जटिल संकट पैदा कर दिया है। बुजुर्ग यदि अपने मन की बात किसी से कह नहीं सकेंगे तो उन्हें मानसिक रूप से बीमारी का संकट हो सकता है। नौजवान पीढ़ी को खाली समय में मोबाइल कंप्यूटर में फेसबुक,व्हाट्सएप इंस्टाग्राम से ही फुर्सत नहीं है। ऐसे में बुजुर्गों के लिए यह संकट और बढ़ता जाएगा।
बुजुर्गों की स्थिति – संजीव ठाकुर
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