महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान (131वा) संशोधन विधेयक- 2026 के लोकसभा में गिरने के बाद सियासी पारा सातवें आसमान पर है। पक्ष-विपक्ष दोनों की ओर से जुबानी जंग जारी है। “तू डाल-डाल, मैं पात-पात” की तर्ज पर एक दूसरे को पछाड़ने में लगे हुए हैं। लेकिन हकीकत यही है कि दोनों “दूध के धुले हुए नहीं हैं”। सब राजनीति कर रहे हैं। कोई कम तो कोई ज्यादा। इनकी राजनीति में महिलाएं पिस रही हैं। भाजपा के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन ने इस मुद्दे को लेकर देशभर में विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है। उसका कहना है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाला इंडी गठबंधन महिला विरोधी है और उसके अड़ियल रवैए के चलते महिला आरक्षण लोकसभा में पारित नहीं हो सका। जबकि कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन का मानना है कि भाजपा महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन को चुपके से लागू करना चाहती थी, जो संविधान के खिलाफ है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि यह संविधान पर आक्रमण था और हमने इसे हरा दिया है। उनका तर्क है कि यह महिला आरक्षण विधेयक नहीं बल्कि हिंदुस्तान का राजनीतिक ढांचा बदलने की कोशिश थी। उन्होंने सरकार से 2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक को लागू करने को कहा। हमारा मानना है कि भाजपा ने बहुमत न होने के बावजूद महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा में पेश कर बड़ा दांव खेला था। अब उसके पास यह कहने का मौका है कि महिला आरक्षण जैसे कदम को विपक्ष ने रोक दिया। वह इसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हो रहे विधानसभा चुनावों में भुनाने में जुट गई है। वहीं, विपक्ष भी अपने स्तर पर भाजपा को संविधान विरोधी बताने की कोशिश में लग गया है। वैसे यह सच है कि संसद से 2023 में महिला आरक्षण कानून बन गया है। लेकिन सरकार उसमें नई जनगणना और परिसीमन को जोड़कर संशोधन विधेयक पेश किया था। शायद विपक्ष नहीं चाहता था कि नई जनगणना और परिसीमन को जोड़ा जाए। साथ ही विपक्ष अलग से ओबीसी कोटे की मांग कर रहा है। ये ऐसे मुद्दे हैं जिसे पक्ष- विपक्ष को मिलकर सुलझाने होंगे। फिलहाल दोनों को एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। भाजपा विपक्ष को महिला विरोधी होने का तमगा बांट रही है, तो विपक्ष भाजपा नीत गठबंधन को संविधान विरोधी बताने में लगा है। इसका नुकसान देश की उन 70 करोड़ महिलाओं का हो रहा है जो इस विधेयक के पारित होने की आस लगाए बैठी थीं। यदि वाकई में सत्ता पक्ष विपक्ष दोनों की मंशा साफ है और महिला आरक्षण विधेयक को लागू करवाना चाहते हैं तो उन्हें परिसीमन, जनगणना और ओबीसी कोटे पर एक टेबल पर आना होगा। वरना हर 5 साल में संसद में विधेयक लाया जाएगा, गिरेगा और चुनावी रैलियों में जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगेंगे। महिला आरक्षण विधायी कम, विशुद्ध चुनावी मुद्दा बन चुका है। संसद में गिरा विधेयक, सड़कों पर दिख रहा है। लोकतंत्र में बहस ठीक है, पर समाधान के बिना वह केवल शोर है। इस मुद्दे पर अब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपना नफा-नुकसान देख रहे हैं। भाजपा को जहां महिला वोट बैंक को साधने का मौका मिला है, तो वहीं उसे बहुमत न जुटा पाने पर “कमजोर फ्लोर मैनेजमेंट” के आरोपों का भी सामना करना पड़ रहा है। साथ ही लोग यह भी कह रहे हैं कहीं यह विधेयक दिखावे के लिए तो नहीं लाया गया था। दूसरी तरफ विपक्ष पर महिला आरक्षण विरोधी होने का ठप्पा लग सकता है। यदि आम जनता तकनीकी बात नहीं समझी तो उसे सीधा नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि, विपक्ष भाजपा के नैरेटिव को “संवैधानिक तकनीक” से काटने में जुट गया है। बहरहाल, विधायी प्रक्रिया भले ही रुक गई है, लेकिन राजनीतिक प्रक्रिया तेज हो गई है। आगे विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव तक यह मुद्दा गरम रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
“तू डाल-डाल, मैं पात-पात”- संजीव वर्मा
Follow Us
