लोकतंत्र की सबसे पहली और बुनियादी शर्त यह है कि व्यवस्था में नागरिक सर्वोपरि हो और सत्ता उसके सेवक के रूप में काम करे। औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश हुक्मरानों का काफिला जब निकलता था, तो आम जनता को डंडों और बंदूकों के बल पर सड़कों के किनारे रोक दिया जाता था। वह दौर गुलामी का था, जहाँ शासक और शासित के बीच खाई को चौड़ा रखना ही हुकूमत की नीति थी। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के सात दशक से अधिक बीत जाने के बाद भी यह औपनिवेशिक मानसिकता हमारे प्रशासनिक तंत्र की रगों से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकी है। आज भी जब देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे नेता या मंत्री गुजरते हैं, तो मीलों लंबा ट्रैफिक रोक दिया जाता है। इस व्यवस्था का सबसे दुखद और अमानवीय पहलू यह है कि अक्सर इन बंद रास्तों पर सायरन बजाती एंबुलेंस फंसी रह जाती हैं। कई बार जिंदगी और मौत से जूझते मरीजों ने सिर्फ इसलिए दम तोड़ दिया क्योंकि किसी बड़े राजनेता का काफिला गुजरने वाला था। दैनिक वेतनभोगी, दफ्तर जाते कर्मचारी, स्कूल-कॉलेज की बसें और परीक्षा देने जा रहे छात्र घंटों धूप, बारिश और प्रदूषण में जाम का शिकार होते हैं। यह सवाल उठना लाजिमी है कि जिस जनता के टैक्स से यह पूरी सुरक्षा व्यवस्था चलती है, उसी जनता को अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों के कारण इतनी प्रताडऩा क्यों झेलनी पड़े? अक्सर इस स्थिति के पीछे का तर्क सुरक्षा और प्रोटोकॉल दिया जाता है। यह सच है कि देश के शीर्ष नेतृत्व की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी है और इसमें कोई ढिलाई नहीं बरती जा सकती। लेकिन सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन कहाँ है? दुनिया के कई विकसित और परिपक्व लोकतंत्रों में शीर्ष नेता बिना आम जनजीवन को प्रभावित किए यात्रा करते हैं। यूरोपीय देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति साइकिल, मेट्रो या सामान्य ट्रैफिक नियमों का पालन करते हुए यात्रा करते देखे जाते हैं। अमेरिका जैसे देश में भी, जहाँ सुरक्षा खतरे अत्यंत संवेदनशील हैं, राष्ट्रपति के काफिले के प्रबंधन में उन्नत तकनीक का उपयोग किया जाता है ताकि यातायात न्यूनतम समय के लिए ही बाधित हो। हमारे देश में आज ‘लाल बत्ती संस्कृति’ को समाप्त करने की दिशा में कुछ कदम जरूर उठाए गए हैं, लेकिन ‘वीआईपी कल्चर’ की जड़ें व्यवस्था में इतनी गहरी हैं कि मानसिकता में कोई खास बदलाव नहीं आया। अब लाल बत्ती की जगह भारी-भरकम सुरक्षा काफिलों और रूट डायवर्जन ने ले ली है। सुरक्षा के नाम पर शक्ति प्रदर्शन की यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के मूल विचार के ही खिलाफ है। एक परिपक्व गणतंत्र वही है जहाँ सत्ता का चेहरा संकोची और विनम्र हो, न कि आम नागरिक को अपनी लाचारी का अहसास कराने वाला। इस व्यवस्था को बदलने के लिए आधुनिक तकनीकी समाधान और नीतिगत इच्छाशक्ति की आवश्यकता है, जैसे ?ग्रीन कॉरिडोर और स्मार्ट सिग्नलिंग लगे, जिसका उपयोग करके केवल कुछ सेकंड या मिनटों के लिए सिग्नल को नियंत्रित किया जा सकता है, न कि आधे-आधे घंटे पहले से सड़कों को सील किया जाए। महानगरों में मेट्रो जैसे साधनों का उपयोग बढ़ाकर सड़कों पर दबाव कम किया जा सकता है, जिससे आम यातायात पर न्यूनतम प्रभाव पड़े। एंबुलेंस और आपातकालीन सेवाओं के लिए शून्य सहिष्णुता का पालन हो। प्रोटोकॉल में यह स्पष्ट और बाध्यकारी नियम होना चाहिए कि किसी भी बड़े वीआईपी काफिले की तुलना में आपातकालीन जीवनरक्षक वाहनों को प्राथमिकता दी जाएगी। यह बदलाव तब तक संभव नहीं होगा जब तक हमारे राजनेता स्वयं आगे आकर इस दिखावे वाली सुरक्षा व्यवस्था को सीमित करने की पहल नहीं करेंगे। जब एक जननेता सामान्य नागरिक की तरह सड़कों पर चलेगा, तभी वह जनता की वास्तविक समस्याओं, गड्ढों, प्रदूषण और ट्रैफिक जाम के दर्द को सीधे महसूस कर पाएगा। वह दिन तभी आएगा, जब सत्ता और प्रशासन यह स्वीकार करेंगे कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा वीआईपी केवल और केवल आम नागरिक है।
आमजन क्यों परेशान हो?- गिरीश पंकज
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