बकरीद पर कुर्बानी से पहले क्यों नहीं काटे जाते बाल और नाखून? जानिए इस्लाम की इस मुकद्दस परंपरा का धार्मिक महत्व

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नई दिल्ली। इस्लाम धर्म का प्रमुख त्योहार ‘ईद-अल-अधा’ यानी बकरीद अब बेहद करीब है। साल 2026 में यह पर्व चांद के दीदार के अनुसार 27 या 28 मई को मनाए जाने की उम्मीद है। ज़ुल हिज्जा का चांद नजर आते ही इस त्योहार की तैयारी शुरू हो जाती है, लेकिन इसके साथ ही एक खास इस्लामी परंपरा की चर्चा भी तेज हो जाती है, “कुर्बानी से पहले बाल और नाखून न काटना।”

इस्लामी मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति अल्लाह की राह में जानवर की कुर्बानी देने का इरादा रखता है, उसके लिए ज़ुल हिज्जा का चांद दिखने से लेकर कुर्बानी होने तक बाल, नाखून या शरीर के किसी भी हिस्से के बाल काटना वर्जित माना गया है। यह परंपरा पैगंबर मोहम्मद (सल्ल.) की हदीसों पर आधारित है। उलेमाओं के मुताबिक, इसका उद्देश्य उन हाजियों के साथ एकजुटता दिखाना है जो हज के दौरान एहराम की स्थिति में होते हैं और सादगी व संयम का पालन करते हैं।

यह अमल केवल शारीरिक सफाई से परहेज नहीं है, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है। यह इंसान को धैर्य (सब्र), अनुशासन और आत्म-संयम सिखाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि बंदा अल्लाह के हुक्म के आगे अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं का त्याग कर रहा है। हालांकि, यह नियम ‘मुस्तहब’ (पसंद किया जाने वाला) है, अनिवार्य नहीं। यदि कोई भूलवश ऐसा कर लेता है, तो उसकी कुर्बानी पर कोई आंच नहीं आती। बकरीद का यह पर्व हमें याद दिलाता है कि असली त्याग केवल जानवर का नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार और बुराइयों का होना चाहिए।