देश की महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को लेकर इस समय घमासान मचा हुआ है। आयोग की कार्यप्रणाली और खासकर उसके द्वारा चलाए गए एसआइआर अभियान पर विपक्ष तो लंबे समय से उंगली उठाता आ रहा है, आरोप लगाता चला आ रहा है, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट ने तहलका मचा दिया है। इसमें चुनाव आयोग के भीतर गड़बड़ियों के सबूत दिये गये हैं। जून 2025 में चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में सुधार के लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआइआर शुरू किया था। सुधार के बाद आई पहली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से देशभर में 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए। विपक्ष आरोप लगाता रहा कि बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए आयोग ने मनमाने ढंग से वोट काटे हैं। 23 सितंबर 2026 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी पड़ताल के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआइआर को लेकर बीते 10 महीनों में कम से कम 14 बार आधिकारिक आपत्तियां दर्ज करवाईं। कई मौकों पर दोनों आयुक्तों को आयोग के नाम पर हुए फैसलों की जानकारी तक नहीं थी। रिपोर्ट के मुताबिक संधू ने कहा कि चुनाव आयोग ने उनके और जोशी की लिखित सलाह के खिलाफ ‘गैरकानूनी’ काम किया। 18 साल से ऊपर के व्यक्ति को वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल करने के लिए फॉर्म-6 भरना होता है। इनमें कई जानकारियां देनी होती हैं। यह भी पूछा जाने लगा- ‘क्या वोटर के माता-पिता या दादा-दादी इससे पहले हुए एसआइआर की वोटर लिस्ट में मौजूद थे?’ फॉर्म भरने में इस सवाल का जवाब देना जरूरी था। मई में विवेक जोशी ने कहा था कि फॉर्म-6 को इस तरह बदला नहीं जा सकता। इसके लिए सरकार को नियम बदलना पड़ेगा। संधू ने भी उनकी इस बात पर सहमति जताई थी। 13 अगस्त को संधू ने आधिकारिक तौर पर कहा कि इस अनाधिकृत और गैरकानूनी तरीके से जोड़े गए सवाल को तुरंत हटाया जाना चाहिए, लेकिन 21 सितंबर तक ये सवाल मौजूद था। चुनावी इलाकों की लोकल वोटर लिस्ट वहां के इलेक्ट्रोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर, यानि ईआरओ तैयार करते हैं। आम तौर पर उस क्षेत्र के एसडीएम ही उस इलाके के ईआरओ होते हैं। ये वोटर लिस्ट आयोग के सॉफ्टवेयर ईआरइनेट (इसकी जगह पहले ईआरओनेट होता था) पर होती है। अगस्त में संधू ने कहा कि राज्यों के कई इलेक्शन ऑफिसर्स ने बताया कि उन्हें ईआरओनेट पोर्टल तक पूरी एक्सेस नहीं मिल रही। संधू ने कहा कि चुनाव आयोग की डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि वो अधिकारियों को कानून से मिली काम करने की आजादी और उनकी एक्सेस को कम करें। पश्चिम बंगाल में एसआइआर के दौरान 60 लाख वोटर्स के नाम में ‘लॉजिकल गड़बड़ी’, यानी उनकी डिटेल्स के मिलान में कमी थी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को इस पर फैसला करने का काम दिया। इनमें से 27 लाख वोटर्स के नाम बाद में चुनाव आयोग ने हटा दिए थे। फिर सुप्रीम कोर्ट ने इस वोटर्स की अपील सुनने का काम हाई कोर्ट के रिटायर्ड जजों के ट्रिब्यूनल को सौंपा। चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि ट्रिब्यूनल के पास 38 लाख अपीलें पेंडिंग थीं। इनमें से 22.21 लाख अपीलें उन वोटर्स की थीं, जो अपना नाम शामिल करना चाहते थे। वहीं 16.10 लाख अपीलें उन वोटर्स के खिलाफ थीं, जिनको न्यायिक अधिकारी पहले ही लिस्ट में शामिल कर चुके थे। यानी इन 16.10 लाख अपीलों में लिस्ट में शामिल लोगों के वोट काटने को कहा गया था। संधू ने कहा, ‘चुनाव आयोग उन वोटर्स के खिलाफ अपील कर रहा था, जिन्हें खुद न्यायिक अधिकारियों ने लिस्ट में शामिल किया था।’ 25 मई 2026 को पश्चिम बंगाल के सीईओ मनोज अग्रवाल को हटाकर राज्य का मुख्य सचिव बना दिया गया था। उनकी इस नियुक्ति पर कई सवाल उठे थे। उनकी जगह बीलम मीना सीइओ बनाई गई थीं। 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिन वोटर्स के मामले में ‘लॉजिकल गड़बड़ी’ है, उन्हें डॉक्यूमेंट्स जमा करने और फाइनल वोटर लिस्ट आने से पहले अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए। चुनाव आयोग तीन सदस्यीय वैधानिक संस्था है। इसलिए जब आरोप लगाए जा रहे हैं, अंदर की खबरें बाहर आ रही हैं, तो चुनाव आयोग को बताना चाहिए कि जो भी फैसले बहुमत से नहीं हुए, वो कैसे जारी हो गए। फॉर्म 6 को फिर से नियमों के मुताबिक बनाना चाहिए। इआरइनेट की स्वतंत्र ऑडिट होनी चाहिए। और आयोग को लेकर जो आरोप लग रहे हैं, उनका खंडन केवल बयानों से नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में यह जरूरी है कि जो भी कहा जा रहा है, उसका प्रमाण हो। विपक्ष तो अपने आरोपों के साथ कई प्रमाण भी देता आ रहा है, लेकिन आयोग की ओर से इन आरोपों को गलत बताया जा रहा है। यही कारण है कि जब अखबार में आयोग के अंदर मचे घमासान और आयुक्तों द्वारा आपत्तियों की खबर प्रकाशित हुई तो विपक्ष को इससे बल मिल गया। अब देश भर में विरोध प्रदर्शन और अदालतों में याचिका लगाए जाने का दौर शुरू हो गया। इसमें खास बात यह भी रही कि आयोग की तरफ से सत्ता पक्ष यानि भारतीय जनता पार्टी को सफाई देने उतरना पड़ा है। लेकिन यह भी विपक्ष के लिए एक मुद्दा बन गया है। विपक्ष संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग भी ला सकता है। देखना होगा कि देश की इस महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था को लेकर जो घमासान मचा है, वह कहां तक पहुंचता है और इसका क्या समाधान निकलता है?
चुनाव आयोग पर घमासान- संजय सक्सेना
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