जगदलपुर। बस्तर के जंगलों में कभी जिस बंदूक की गूंज से खौफ पैदा होता था, आज वही हथियार माओवादी साम्राज्य के ढहने की सबसे बड़ी गवाही दे रहे हैं। कभी अभेद्य किला माने जाने वाले इस क्षेत्र में अब ‘लाल नेटवर्क’ की कमर पूरी तरह टूट चुकी है। सुरक्षा बलों की आक्रामक रणनीति और अंदरूनी इलाकों में बढ़ती पैठ ने नक्सलियों को उस मोर्चे पर मात दी है, जिसे वे अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते थे। अब हालात यह हैं कि, माओवादियों की पहचान रहे अत्याधुनिक हथियार भारी संख्या में सुरक्षा बलों के कब्जे में पहुँच रहे हैं, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि, संगठन का पतन अब निकट है।
सुरक्षा बलों का फोकस अब केवल मुठभेड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे माओवादियों की सैन्य रीढ़ यानी उनके हथियारों के जखीरे पर सीधा प्रहार कर रहे हैं। आँकड़ों पर गौर करें तो पिछले दो वर्षों में रिकवरी का ग्राफ अविश्वसनीय रूप से बढ़ा है। साल 2025 में रिकॉर्ड 677 और 2026 में अब तक 316 हथियार बरामद किए जा चुके हैं। AK-47, INSAS और SLR जैसे हथियारों का छिनना नक्सलियों के गिरते मनोबल को दर्शाता है। विशेष रूप से करेगुट्टा ऑपरेशन (KGF) के दौरान हथियार बनाने वाली मशीनों की जब्ती ने उनकी आत्मनिर्भरता को खत्म कर दिया है।
कभी कोरापुट शस्त्रागार लूट और ताड़मेटला जैसे हमलों से जुटाया गया जखीरा अब खाली हो रहा है। जंगलों और गुफाओं में छिपाकर रखे गए ‘डंप’ अब सुरक्षा बलों की सक्रियता से लगातार उजागर हो रहे हैं। हथियारों की इस किल्लत ने माओवादियों की हमलावर क्षमता को लगभग शून्य कर दिया है, जिससे मजबूर होकर कैडर मुख्यधारा में लौट रहे हैं। कभी दहशत का पर्याय रहे ये हथियार अब बस्तर के जंगलों में एक खूनी अध्याय के अंत और शांति की नई शुरुआत की कहानी बयां कर रहे हैं।
