छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के लखनपुर जनपद अंतर्गत आने वाला केवरी गाँव आज पूरे प्रदेश में एक मिसाल बन चुका है। ग्रामीण दक्षेत्रों में सामाजिक सुधार और जनजागरूकता की दिशा में केवरी की ग्राम पंचायत द्वारा उठाया गया यह कदम बेहद सराहनीय और प्रेरणादायक है। पंचायत द्वारा गाँव में शराबबंदी लागू करने का फैसला और पिछले एक महीने के भीतर इस नियम का कड़ाई से पालन कराते हुए शराबियों पर कार्रवाई और अर्थदंड वसूलना यह साबित करता है कि यदि ग्रामीण यन लें, तो समाज से बड़ी से बड़ी कुप्रथाओं और बुराइयों को जह से मिटाया जा सकता है। भारत के आदिवासी और ग्रामीण अंचलों में शराबखोरी एक ऐसी गंभीर समस्या बन चुकी है जो न केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य को तबाह करती है, बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक संकट में धकेल देती है। अत्यधिक शराब सेवन के कारण अक्सर घरों में आपसी झगड़े, महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार जैसी घटनाएं आम हो जाती हैं। मेहनत से कमाए गए पैसे का एक बड़ा हिस्सा शराब पर खर्च हो जाता है, जिससे गरीब परिवार कर्ज के जाल में फंस जाते हैं और बच्चों की शिक्षा व पोषण पर बुरा असर पड़ता है। गांवों के युवा जब इस लत की चपेट में आते हैं, तो उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है और वे रचनात्मक कार्यों से दूर हो जाते हैं। ऐसे समय में केवरी गांव की पंचायत का यह ऐतिहासिक कदम इन सभी समस्याओं पर सीधा प्रहार है। केवरी गांव के जनप्रतिनिधियों, बुजुर्गों और जागरूक नागरिकों ने मिलकर जो यह साहसी निर्णय लिया, यह प्रशासनिक और सामाजिक समन्वय का बेहतरीन उदाहरण है। पिछले एक महीने में पंचायत स्तर पर बनाई गई निगरानी समितियों ने सक्रियता दिखाते हुए नियमों का उबंधन करने बालों पर आर्थिक दंड लगाया है। यह दंडात्मक कार्रवाई केवल + सजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे लोगों को इस गलत आदत से दूर रखने का मनोवैज्ञानिक दबाव और कड़ा संदेश है। जब गांव का नेतृत्व मजबूत होता है।और सामूहिक हित सर्वोपरि रखे जाते हैं, इस तरह के नियम केवल कागजों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जमीन पर असर दिखाते हैं। काश! बेंचरी की इस सफलता को देखकर पांढुर्णा संभाग सहित पूरे छत्तीसगढ़ और देश के अन्य आदिवासी व गैर-आदिवासी गांवों में भी ऐसी व्यवस्थाएं लागू हो जाएँ तो कितना अच्छा हो ! यदि इस गाँव अपनी खुद की एक स्वशासित नगर व्यवस्था तैयार कर लें, तो धीरे-धीरे संपूर्ण ग्रामीण अंचल से नशामुक्ति की यह आदत हमेशा के लिए खत्म हो सकती है। गांवों की महिला एक स्वास्थ्य समूह को और सशक्त किया गया, क्योंकि नशबंदी के आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका सबसे प्रभावी रही है। खेलकूद, शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से युवाओं को रचनात्मक और सकारात्मक दिशा दी जाए। स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग भी पंचायतों के ऐसे सकारात्मक और सामूहिक हित के नियमों का खुलकर समर्थन करें। बेंचरी गाँव ने यह दिखा दिया है कि बदलाव की शुरुआत बाहर से नहीं, बल्कि गाँव की चौपाल और पंचायत भवन से ही होती है। यदि यह मॉडल हर जगह फैल जाए, तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे गाँव पूरी तरह आत्मनिर्भर, समृद्ध और खुशहाल नजर आएँगे। बेंचरी ग्राम पंचायत द्वारा नशामुक्ति को लेकर लागू किए गए कड़े नियमों और नियम बनाने वाले समाज के लिए एक बड़ा उदाहरण है। पंचायत और ग्रामसभा द्वारा मिलकर निम्नलिखित प्रमुख सुधार और व्यवस्थाएं लागू की गई हैं, जिसे नियमों का सख्ती से पालन कराने के लिए पंचायत ने उल्लंघनकर्ताओं पर कड़े आर्थिक दंड का नियम किया है। गांव में शराब बेचने या निर्माण करने पर पांच हजार जुर्माना देना होगा। गांव में शराब पीने पर पंद्रह सौ रुपये का जुर्माना। शराब के नशे में आपसी विवाद या लड़ाई-झगड़ा करने पर तीन हजार रुपये का जुर्माना। दूसरे गाँव से शराब पीकर बेंचरी गाँव की सीमा में आने पर तीन हजार रुपये का जुर्माना। नशामुक्ति के नियमों को कड़ी निगरानी के लिए पंचायत के इन क्षेत्रों में निगरानी समितियाँ और महिला समितियों का गठन किया गया है। यह समितियां गांव बने हर गतिविधि पर नजर रखती हैं ताकि कोई भी व्यक्ति नियम न तोड़ सके। नियम लागू करने के पहले शुरू में घर-घर जाकर पंचायत छोटे बड़े उम्र की बुराइयों-कुप्रथाओं लाओ, नशे से दूर-धकेल जरूरी और गांव छोटी-परिवार जोड़ने जैसी बातों का मुख्य उद्देश्य निकालकर लोगों की जागरूक किया गया। पंचायत द्वारा अर्थदंड के रूप में वसूली जाने वाली राशि को व्यक्तिगत उपयोग में न लाकर गांव के विकास कार्यों और सामाजिक हित में खर्च करने का प्रावधान किया गया है।
केवरी गाँव का कमाल !-गिरीश पंकज
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