रायपुर। छत्तीसगढ़ को विज्ञान, तकनीक और आधुनिक अनुसंधान के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने के लिए राज्य सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बेंगलुरु के निदेशक प्रोफेसर जी. रंगराजन और संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिकों के साथ बैठक कर प्रदेश में तीन बड़ी परियोजनाओं को लेकर चर्चा की। इन योजनाओं का उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी शिक्षा, औद्योगिक विकास और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत बनाना है। सरकार का विशेष जोर बस्तर, सरगुजा और अन्य दूरस्थ क्षेत्रों के युवाओं को बेहतर शिक्षा और आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण के अवसर उपलब्ध कराने पर है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ को खनिज और औद्योगिक संपदा के साथ-साथ विज्ञान, नवाचार और उच्च शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित करना सरकार की प्राथमिकता है। प्रदेश के ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में प्रतिभाशाली युवाओं की कमी नहीं है, जरूरत उन्हें आधुनिक संसाधन, प्रयोगशालाएं और विशेषज्ञों का मार्गदर्शन देने की है। इसी उद्देश्य से प्रस्तावित परियोजनाओं की तकनीकी, वित्तीय और संस्थागत संभावनाओं का परीक्षण कर आगे की कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।
तीन प्रमुख परियोजनाओं पर रहेगा फोकस
बैठक में IISc और छत्तीसगढ़ सरकार के बीच तीन महत्वपूर्ण योजनाओं पर सहयोग की संभावनाओं पर विचार किया गया। इनमें विश्वस्तरीय मटेरियल कैरेक्टराइजेशन एवं टेस्टिंग सेंटर की स्थापना, विज्ञान और गणित के बेहतर शिक्षक तैयार करने के लिए चार वर्षीय एकीकृत बीएससी-बीएड संस्थान तथा चिकित्सा अनुसंधान और आधुनिक स्वास्थ्य तकनीकों के विकास में सहयोग शामिल है।
600 शोधार्थियों के प्रशिक्षण की क्षमता वाला टेस्टिंग सेंटर
पहली परियोजना के अंतर्गत प्रदेश में आधुनिक मटेरियल कैरेक्टराइजेशन एंड टेस्टिंग सेंटर विकसित करने का प्रस्ताव है। यहां खनिज, इस्पात, धातु, ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े उद्योगों को उच्चस्तरीय जांच और अनुसंधान की सुविधाएं मिल सकेंगी। केंद्र में अत्याधुनिक माइक्रोस्कोपी, एक्स-रे विश्लेषण, नैनो टेक्नोलॉजी, उच्च तापमान परीक्षण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विश्लेषण की व्यवस्था विकसित करने की योजना है। इस केंद्र में एक समय पर लगभग 600 शोधार्थियों और विद्यार्थियों के आवासीय प्रशिक्षण की सुविधा प्रस्तावित है। इसके माध्यम से तीन वर्षों में करीब 1,800 विद्यार्थियों को उन्नत वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रशिक्षण देने का लक्ष्य रखा गया है। इससे प्रदेश के विश्वविद्यालयों, इंजीनियरिंग संस्थानों, उद्योगों और स्टार्टअप को भी फायदा मिलने की उम्मीद है।
विज्ञान और गणित के विशेषज्ञ शिक्षक तैयार होंगे
दूसरी परियोजना के तहत चार वर्षीय एकीकृत बीएससी-बीएड पाठ्यक्रम के लिए विशेष संस्थान स्थापित करने पर चर्चा हुई। इसका उद्देश्य विज्ञान और गणित विषयों में दक्ष शिक्षकों की नई पीढ़ी तैयार करना है, जिन्हें आधुनिक शिक्षण तकनीकों का भी ज्ञान हो। प्रस्तावित संस्थान में 14 आधुनिक शिक्षण प्रयोगशालाएं, 600 विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था, डिजिटल शिक्षा सुविधाएं, पुस्तकालय और आधुनिक व्याख्यान कक्ष विकसित करने की योजना है। इसके अलावा 25 पूर्णकालिक शिक्षकों की नियुक्ति का प्रस्ताव भी शामिल है। संस्थान के पाठ्यक्रम निर्माण, प्रयोगशालाओं और शैक्षणिक गुणवत्ता को बेहतर बनाने में IISc से सहयोग लेने पर विचार किया गया।
मेडिकल रिसर्च और डिजिटल हेल्थ को मिलेगा बढ़ावा
तीसरी परियोजना के अंतर्गत चिकित्सा अनुसंधान, डिजिटल हेल्थ, आधुनिक चिकित्सा उपकरणों और कम लागत वाली स्वास्थ्य तकनीकों के विकास में IISc की विशेषज्ञता का लाभ लेने की योजना है। इसके लिए हब एंड नेटवर्क मॉडल पर काम करने की संभावना जताई गई है, जिसके तहत IISc को प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों, अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और औद्योगिक संस्थानों से जोड़ा जा सकता है। इस पहल में आधुनिक जांच तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित स्वास्थ्य सेवाएं, क्लिनिकल रिसर्च, संयुक्त प्रयोगशालाएं और विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल किए जा सकते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि नई तकनीकों के इस्तेमाल से दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता तथा गुणवत्ता बेहतर बनाई जा सकती है।
सेमीकंडक्टर और AI में युवाओं को मिलेगा प्रशिक्षण
बैठक में विद्यार्थियों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन देने के साथ ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन रिसर्च इंटर्नशिप उपलब्ध कराने पर भी चर्चा हुई। इसके अलावा आधुनिक प्रयोगशाला तकनीकों का प्रशिक्षण और विशेषज्ञ वैज्ञानिकों के व्याख्यान आयोजित करने की संभावनाएं तलाशी गईं। सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जैव प्रौद्योगिकी और अन्य उभरते क्षेत्रों में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने पर भी विचार किया गया। मुख्यमंत्री ने कहा कि इन कार्यक्रमों में सरकारी शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों के साथ ग्रामीण और जनजातीय अंचलों के युवाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे बस्तर और सरगुजा के विद्यार्थियों को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक अनुसंधान से जुड़ने का अवसर मिल सकेगा।
बस्तर और सुकमा में जल संरक्षण तकनीकों पर चर्चा
बैठक के दौरान जल संरक्षण और ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप तकनीकी समाधान विकसित करने पर भी विचार-विमर्श हुआ। IISc के वैज्ञानिकों ने बस्तर और सुकमा सहित विभिन्न इलाकों में बिना बिजली के पानी के प्रवाह से चलने वाले हाइड्रोलिक रैम और टरबाइन पंप के उपयोग से जुड़े कार्यों की जानकारी दी। इसके साथ ही शोधित पानी के दोबारा उपयोग, जलाशयों में पानी की उपलब्धता बढ़ाने और भूजल स्तर सुधारने के उपायों पर भी चर्चा हुई। इस दौरान कर्नाटक के कोलार जिले की उस परियोजना का उदाहरण दिया गया, जिसमें प्रतिदिन 440 मिलियन लीटर शोधित पानी को 137 जलाशयों तक पहुंचाया जा रहा है।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का वास्तविक उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक उसका लाभ पहुंचाना होना चाहिए। विज्ञान और तकनीक का उपयोग ग्रामीण जीवन को बेहतर बनाने के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए भी किया जाना जरूरी है। बैठक में IISc के निदेशक प्रोफेसर जी. रंगराजन, प्रोफेसर पी.एस. अनिल कुमार, प्रोफेसर सत्यम सुवास और प्रोफेसर सतीश राघवन सहित संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक मौजूद रहे। राज्य शासन की ओर से निवेश आयुक्त ऋतु सेन, मुख्यमंत्री के सचिव राहुल भगत, उच्च शिक्षा विभाग के सचिव अविनाश चंपावत, स्वास्थ्य विभाग के सचिव अमित कटारिया और कौशल विकास विभाग के सचिव डॉ. बसवराजू सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि विकसित छत्तीसगढ़ 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। IISc बेंगलुरु के साथ प्रस्तावित सहयोग से प्रदेश में वैज्ञानिक सुविधाओं, तकनीकी शिक्षा और आधुनिक अनुसंधान को विस्तार देने की दिशा में नई संभावनाएं खुल सकती हैं।

