o कांकेर जिले में हर्षोल्लास से मनाया गया पोरा तिहार, बैलों की पूजा कर किसानों ने जताई कृतज्ञता
o माटी की सोंधी महक और लोकपरंपराओं से सजा पोरा तिहार, प्रकृति-पशुधन संरक्षण का दिया संदेश
कांकेर/दुर्गूकोंदल। छत्तीसगढ़ की माटी की सोंधी महक, किसान के पसीने और लोक परंपराओं का प्रतीक ‘पोरा तिहार’ गुरुवार को भाद्रपद अमावस्या के अवसर पर पूरे प्रदेश के साथ कांकेर जिले के वनांचल अंचल दुर्गूकोंदल में भी विशेष हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। यह पर्व अन्नदाता किसानों के परिश्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बैलों एवं पशुधन के प्रति सम्मान, प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। दुर्गूकोंदल अंचल में यह पर्व आदिवासी संस्कृति, लोक आस्था और कृषि परंपराओं के अनूठे संगम के रूप में आज भी जीवंत है।
छत्तीसगढ़ी में ‘पोरा’ शब्द का संबंध मिट्टी से बने छोटे-छोटे बर्तनों के प्रतिरूप ‘चुकी पोरा’ से माना जाता है। इस अवसर पर नंदी स्वरूप मिट्टी के बैलों की पूजा की जाती है। एक अन्य लोक मान्यता के अनुसार इस समय धान की बालियों में दूध भरने की प्रक्रिया शुरू होती है, जिसे ग्रामीण अंचलों में ‘पोर फुटना’ कहा जाता है। दुर्गूकोंदल अंचल से जुड़े शिक्षाविद् एवं सांस्कृतिक चिंतक डॉ. संजय वस्त्रकार के अनुसार पोरा तिहार का गहरा संबंध धरती, अन्न और प्रकृति से है। लोकमान्यता है कि पोरा के दिन अन्नमाता गर्भधारण करती हैं, इसलिए धरती मां के गर्भ का पूजन किया जाता है और किसान इस दिन खेतों में नहीं जाते। उनके अनुसार यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, पशुधन और कृषि के प्रति संवेदनशीलता तथा संतुलित एवं अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। उन्होंने आधुनिक समय में पशुधन की घटती उपयोगिता के बीच इस परंपरा के प्रतीकात्मक महत्व को बनाए रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
पोरा तिहार के दिन किसान सुबह जल्दी उठकर अपने बैलों को स्नान कराते हैं। उनके सींगों को आकर्षक रंगों से सजाया जाता है तथा गले में घुंघरू, घंटियां और कौड़ियों से बने आभूषण पहनाए जाते हैं। इसके बाद बैलों के साथ कृषि उपकरणों की भी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। घरों में ठेठरी, खुरमी, चौसेला, गुरहा चीला, सोहारी, अनरसा, बरा, मुरकू, भजिया, मूठिया, गुजिया और तसमई जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। दुर्गूकोंदल क्षेत्र में पोरा की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। स्थानीय बाजारों में मिट्टी के बैल, नंदी और चुकी पोरा सहित विभिन्न प्रकार के मिट्टी के खिलौने सज जाते हैं। बैलों की संख्या कम होने के कारण कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के बैल बच्चों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहते हैं। बच्चे मिट्टी के नंदिया बैला और चुकी पोरा को रस्सी बांधकर गलियों में घुमाते हैं। वहीं कई स्थानों पर युवतियां गौठान और तालाब पार में ‘पोरा पटकने’ की परंपरा निभाती हैं।
अंचल में कई स्थानों पर बैल सज्जा और बैल दौड़ प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है। दुर्गूकोंदल के समीप संबलपुर में प्रतिवर्ष भव्य बैला दौड़ आयोजित होती है, जिसमें आसपास के गांवों के किसान सजे-धजे बैलों के साथ भाग लेते हैं। ग्राम मड़ियापार में विगत 62 वर्षों से पारंपरिक पोरा महोत्सव आयोजित किया जा रहा है, जिसमें बैल सजावट, बैल दौड़ और गेड़ी दौड़ सहित विभिन्न कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र रहते हैं। छत्तीसगढ़ में यह पर्व मुख्यतः पोरा या पोरा तिहार के नाम से जाना जाता है, जबकि दुर्गूकोंदल अंचल में इसे पोला नाम से भी पुकारा जाता है। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश सहित पड़ोसी क्षेत्रों में भी यह पर्व पोला के नाम से प्रचलित है। क्षेत्रवार अलग-अलग परंपराओं के बावजूद इसके मूल में कृषि, पशुधन, प्रकृति और लोक आस्था के प्रति सम्मान की भावना समान है।
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मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी तीजा-पोरा तिहार को छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और कृषि परंपरा का प्रतीक बताते हुए कहा है कि ऐसे लोकपर्व संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रखने के साथ समाज में आत्मीयता और समरसता को मजबूत करते हैं। पूरे कांकेर जिले में जैसे वनांचल अंचलों में पोरा तिहार आज भी सामूहिकता, कृतज्ञता, प्रकृति-प्रेम और लोकसंस्कृति का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व संदेश देता है कि अन्नदाता किसान, पशुधन और प्रकृति के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता ही हमारी समृद्ध लोकसंस्कृति की वास्तविक पहचान है।
आज अंगना विधायक कार्यालय, बेवरती में पारंपरिक एवं लोकपर्व पोला तिहार हर्षोल्लास और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर ग्रामीण अंचल की समृद्ध परंपरा, कृषि संस्कृति और लोक आस्था की सुंदर झलक देखने को मिली। पोला तिहार किसानों और पशुधन के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता का पर्व है, जो हमारी मिट्टी और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है।
सभी क्षेत्रवासियों को पोला तिहार की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

