हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के कुलपति पर शिकायतों की जांच तेज, दस्तावेजों की पड़ताल के लिए पहुंची समिति

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दुर्ग। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग के कुलपति प्रो. (डॉ.) संजय तिवारी के खिलाफ सामने आई वित्तीय, प्रशासनिक और मूल्यांकन से जुड़ी शिकायतों की जांच अब आगे बढ़ गई है। राज्यपाल सचिवालय द्वारा संबंधित नस्तियां, नोटशीट और अन्य अभिलेख उपलब्ध कराने के लिए तय की गई समय-सीमा समाप्त होने के बाद जांच समिति विश्वविद्यालय पहुंची। समिति के सदस्यों ने मौके पर पहुंचकर शिकायतों से जुड़े दस्तावेजों और रिकॉर्ड की जांच शुरू की है। इस कार्रवाई के बाद विश्वविद्यालय के प्रशासनिक स्तर पर भी हलचल बढ़ गई है।

कुलपति के खिलाफ शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ के राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति ने उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की थी। राज्यपाल के सचिव डॉ. सीआर प्रसन्ना ने 30 जुलाई को समिति के गठन से संबंधित आदेश जारी किया था। बताया गया है कि दुर्ग ग्रामीण विधायक एवं छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष ललित चंद्राकर ने कुलपति के खिलाफ कई बिंदुओं पर कुलाधिपति के समक्ष शिकायत की थी। इसके बाद मामले की जांच प्रक्रिया शुरू हुई। राज्यपाल सचिवालय ने 19 अगस्त को आवश्यक दस्तावेज और नस्तियां उपलब्ध कराने के निर्देश देते हुए 24 अगस्त तक की समय-सीमा तय की थी। बाद में कुलपति की ओर से विभिन्न विभागों से रिकॉर्ड जुटाने और उच्च शिक्षा विभाग से जानकारी प्राप्त करने के लिए आरटीआई आवेदन किए जाने का हवाला देते हुए अवधि 31 अगस्त तक बढ़ाने का अनुरोध किया गया था।

शिकायत में उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी, नए पाठ्यक्रमों की मान्यता, पुस्तकों की खरीद और अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति समेत कई मामलों पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि मार्च 2026 में करीब 12 लाख से अधिक उत्तरपुस्तिकाओं की खरीदी के लिए निविदा प्रक्रिया अपनाई गई थी, जिसमें शासकीय फर्म ‘संवाद’ द्वारा न्यूनतम दर दिए जाने के बावजूद एक निजी फर्म के पक्ष में कार्य आवंटन की अनुशंसा की गई और बाद में उसे भुगतान किया गया। शिकायत में इस भुगतान को 40 लाख रुपये से अधिक बताया गया है। इसी तरह एमबीए, एमसीए और पीजीडीबीएम समेत आठ नए पाठ्यक्रमों की शुरुआत में आवश्यक अनुमति और मान्यता की प्रक्रिया को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि नए पाठ्यक्रमों के लिए करीब 40 लाख रुपये की 380 पुस्तकें बिना विधिवत निविदा प्रक्रिया के खरीदी गईं। वहीं, पांच विषयों के लिए 15 अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया है कि कुछ महत्वपूर्ण वित्तीय फैसले कार्यपरिषद की मंजूरी के बिना लिए गए। हालांकि, इन सभी आरोपों की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। फिलहाल जांच समिति विश्वविद्यालय में उपलब्ध रिकॉर्ड और दस्तावेजों का परीक्षण कर रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह सामने आएगा कि शिकायतों में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और किन मामलों में नियमों का पालन हुआ या उल्लंघन। कुलपति का पक्ष सामने आने पर उसे भी रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा।