राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का कथन है भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि आज आप क्या करते हैं। वर्तमान का प्रत्येक क्षण भविष्य की नींव रखता है। समय का सदुपयोग और नियमित परिश्रम ही आने वाले कल को उज्ज्वल बनाते हैं। मानव जीवन की सबसे बड़ी शक्ति यदि कोई है, तो वह है आशा। आशा वह अदृश्य ऊर्जा है जो निराशा के घोर अंधकार में भी मनुष्य के भीतर प्रकाश जलाए रखती है। यही आशा मन में सपनों को जन्म देती है और वही सपने मनुष्य को साधारण से असाधारण बनने की प्रेरणा देते हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि केवल सपने देख लेने से मंजि़ल नहीं मिलती। सपनों को साकार करने के लिए दृढ़ संकल्प, अनुशासन, निरंतर अभ्यास और कठोर श्रम की आवश्यकता होती है। इसीलिए कहा जाता है कि आशाओं पर आकाश टिका है और सपनों के पीछे किया गया सार्थक कठोर श्रम ही सफलता की वास्तविक कुंजी है। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। संत कबीर। मानव सभ्यता का इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि संसार की प्रत्येक महान उपलब्धि किसी व्यक्ति के मन में जन्मे एक छोटे-से स्वप्न से प्रारंभ हुई। जब उन स्वप्नों को परिश्रम का आधार मिला, तब वे इतिहास बन गए। यदि राइट बंधुओं ने उडऩे का सपना न देखा होता, यदि एडिसन ने अंधकार मिटाने का संकल्प न लिया होता, यदि भारत के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में अपनी पहचान बनाने का सपना न देखा होता, तो मानव प्रगति का स्वरूप आज कुछ और होता। भारत के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था- ‘सपने वे नहीं जो आप नींद में देखते हैं, सपने वे हैं जो आपको सोने नहीं देते।Ó यह कथन बताता है कि वास्तविक सपना वही है जो व्यक्ति के भीतर बेचैनी पैदा करे और उसे निरंतर कर्म करने के लिए प्रेरित करे। डॉ. कलाम स्वयं अत्यंत साधारण परिवार से थे, लेकिन उनकी अटूट लगन, अनुशासन और अथक परिश्रम ने उन्हें ‘मिसाइल मैनÓ और भारत के राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद तक पहुँचाया। स्वामी विवेकानंद का प्रेरक संदेश आज भी करोड़ों युवाओं के लिए जीवन-दर्शन है- ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।Ó यह केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि सफलता का शाश्वत सूत्र है। जीवन में वही व्यक्ति आगे बढ़ता है जो कठिनाइयों से घबराने के बजाय उनका सामना करता है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं- ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।Ó अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता में नहीं। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना महाभारत के समय था। जो व्यक्ति बिना परिणाम की चिंता किए पूरी निष्ठा से कर्म करता है, सफलता अंतत: उसी के चरण चूमती है। ‘धैर्य सफलता का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।Ó वास्तव में अधीर व्यक्ति मंजि़ल से पहले ही थक जाता है, जबकि धैर्यवान व्यक्ति अंतत: अपने लक्ष्य तक पहुँच ही जाता है। महान आविष्कारक थॉमस अल्वा एडिसन ने हजारों असफल प्रयोगों के बाद विद्युत बल्ब का सफल आविष्कार किया। उन्होंने कहा था प्रतिभा एक प्रतिशत प्रेरणा और निन्यानवे प्रतिशत परिश्रम है। यह कथन इस भ्रम को तोड़ देता है कि सफलता केवल प्रतिभाशाली लोगों को मिलती है। वास्तव में सफलता उसी को मिलती है जो लगातार प्रयास करता रहता है। प्रकृति स्वयं हमें श्रम का संदेश देती है। सूर्य प्रतिदिन बिना रुके उदित होता है, नदी निरंतर बहती रहती है, वृक्ष वर्षों तक धूप, वर्षा और आँधियों को सहकर फल देते हैं। चींटी बार-बार गिरकर भी अपने लक्ष्य तक पहुँच जाती है। प्रकृति का प्रत्येक दृश्य यह सिखाता है कि निरंतर कर्म ही विकास का नियम है। आज के प्रतिस्पर्धी युग में केवल डिग्री या प्रतिभा पर्याप्त नहीं है। सफलता के लिए ज्ञान के साथ कौशल, अनुशासन, समय प्रबंधन, सकारात्मक सोच और निरंतर अभ्यास आवश्यक है। जो युवा अपने समय का सम्मान करते हैं, लक्ष्य निर्धारित करते हैं और कठिन परिश्रम से पीछे नहीं हटते, वही भविष्य के निर्माता बनते हैं। इतिहास के पन्ने ऐसे असंख्य उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जहाँ साधारण परिस्थितियों में जन्मे लोगों ने अपने परिश्रम से असाधारण उपलब्धियाँ हासिल कीं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हमारे युवाओं में केवल बड़े सपने देखने की प्रवृत्ति ही न हो, बल्कि उन सपनों को साकार करने के लिए कठिन परिश्रम करने का साहस भी हो। मोबाइल और सोशल मीडिया के आकर्षण में समय नष्ट करने के बजाय यदि वही समय अध्ययन, कौशल विकास, नवाचार और आत्मविकास में लगाया जाए, तो भारत का भविष्य और भी उज्ज्वल हो सकता है। यही कहा जा सकता है कि आशा जीवन का प्रकाश है, सपना उसकी दिशा है और परिश्रम उसकी गति। ये तीनों मिलकर ही सफलता का स्वर्णिम अध्याय लिखते हैं। भाग्य अवसर दे सकता है, लेकिन उपलब्धि केवल कर्म देता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को बड़े सपने देखने चाहिए, परंतु उनसे भी बड़ा अपना पुरुषार्थ बनाना चाहिए।
श्रम ही सफलता की कुंजी-– संजीव ठाकुर
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