” पंचमुखी होकर प्रभु की रक्षा की हनुमान ने “- डॉ. सूर्यकांत मिश्रा 

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हनुमान जन्मोत्सव 2 अप्रैल…
भक्त की भक्ति और उसके समर्पण को जानना हो तो हमें इस कलयुग में अपनी भक्ति के प्रति समर्पित पवन पुत्र हनुमान की महिमा को अपने स्मरण में लाना होगा । पूरी दुनिया में ऐसा कोई भगवान और भक्त नहीं जैसा हमारे हिंदुस्तान में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और उनके परम भक्त हनुमान का स्नेह रहा है । कहते हैं कि इस दुनिया का संचालन भगवान राम की कृपा के बिना नहीं हो सकता । जी ! हां ! यह शाश्वत सत्य भी है । भगवान श्रीराम भी यह अनुभव करते हैं कि उनके छोटे – बड़े सारे काम अधूरे हैं , यदि उनके अनन्य भक्त पवन पुत्र हनुमान उनके पास नहीं हैं ! भगवान श्रीराम और हनुमान का साथ ऐसा है जैसे मनुष्य के शरीर के भीतर हृदय की धड़कन और रक्त संचार का ! भारतवर्ष की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और उसकी गहरी जड़ें , प्राचीन पौराणिक कथाओं को हमारी मान्यताओं की कड़ी में पिरोती हैं ! यही वे मान्यताएं हैं जिन्हें हम पूजा के रूप में अनेक देवताओं के प्रतिरूप के समक्ष साक्षात् रूप में पाते हैं । ऐसे ही देवताओं में सर्वमान्य देवता के रूप में हमारे जीवन में भक्त शिरोमणि हनुमान जी ने अकाट्य स्थान बनाया हुआ है । हिंदू धर्मशास्त्रों में मिलने वाली अनेक पौराणिक कथाओं में भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान जी की बुद्धि – कौशल से जुड़ी शक्ति का दर्शन हमें होता रहा है । हनुमान जी की युद्ध कला और रूप परिवर्तन ने राम – रावण युद्ध का दृश्य ही बदल दिया !

हनुमान जी को पूरी दुनिया मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के परम भक्त के रूप में जानती और पूजती है । यह भी मान्यता और आस्था है कि हनुमान जी की नियमित पूजा – अर्चना के साथ उनके आराध्य भगवान श्रीराम के प्रति अकाट्य विश्वास से मनुष्य के हर प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं । हनुमान जी ऐसे महान भक्त हुए हैं जिनके विषय में रामायण , रामचरित मानस एवं महाभारत में अनेक कथाएं मिलती हैं । मुझे आज बजरंगबली के पंचमुखी अवतार पर लिखने की प्रेरणा शायद हनुमान जी से ही प्राप्त हो रही है । ऐसे कौन से कारण और परिस्थितियां थीं , जिसने हनुमान जी को पंचमुखी अवतार लेने की प्रेरणा दी ? हनुमान जी का पंचमुखी रूप वास्तुशास्त्र में भी उत्तम बताया गया है । घर के मुख्य द्वार में इस रूप की मूर्ति अथवा चित्र लगाए जाने से हर प्रकार की बाधा दूर भाग जाती है । इस रूप की नियमित पूजा से उनके भक्तों को आत्मिक शांति और आनंद की प्राप्ति होती है । बजरंगबली ने अपने प्रभु श्रीराम और उनके भ्राता लक्ष्मण जी की रक्षा के लिए पंचमुखी अवतार लिया । राम – रावण युद्ध के दौरान जब रावण पस्त होने लगा तो उसने छल करते हुए अपने भाई अहिरावण का सहारा लिया । तंत्र विद्या में पारंगत अहिरावण को मां भगवती का आशीर्वाद था कि उसे वही मार सकता है जो पांच दिशाओं में जल रहे दीपों को एक फूक में बुझा दे ! अहिरावण ने अपनी तंत्र विद्या के बल पर श्रीराम जी की सेना को गहरी नींद में सुला दिया ! इसके साथ ही वह भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी को अपहृत कर पाताल लोक ले गया !

हनुमान जी के भक्त जानते हैं कि अपने प्रभु को बचाने के लिए पवन पुत्र ने पंचमुखी अवतार लिया । इन पांच रूपों में हनुमान जी का पहला मुख वानर का था । दूसरा मुख गरुड़ का । तीसरा वराह का । चौथा नृसिंह का और पांचवां मुख अश्व अर्थात घोड़े का था । प्रश्न यह उठता है कि इन पांचों मुखों के सहारे हनुमान जी ने पांच दिशाओं में जल रहे दीपों को कैसे बुझाया ? बजरंगबली का पहला मुख जो वानर रूप में था , वह पूर्व दिशा की ओर था । वानर मुख शत्रुओं पर विजय का प्रतीक माना जाता है । इसी तरह दूसरा मुख गरुड़ का था जो पश्चिम दिशा किनार था । गरुड़ मुख जीवन की रुकावटों को दूर करने वाला माना जाता है । तीसरा मुख जो वराह का था वह उत्तर दिशा की ओर था । वराह मुख आयु वृद्धि का द्योतक है । चौथा मुख नृसिंह भगवान के रूप में दक्षिण दिशा की ओर था । इसे हर प्रकार के भय को खत्म करने वाला माना जाता है । पांचवां मुख अश्व ( घोड़ा ) का था , जो आकाश को निहार रहा था । इसे अपार शक्ति प्रदाता माना जाता है । इस स्वरूप को धारण कर पवन पुत्र हनुमान ने पाताल लोक में प्रवेश किया और पांचों मुख की अपार शक्ति के चलते सभी पांचों दीपों की लौ को एक ही फूंक में बुझाकर उन्होंने अहिरावण का वध कर डाला ! अपने प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी को अपने कंधों में आसन देकर वे सुरक्षित लाने में सफल रहे । हनुमान जी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए भक्तों को इस मंत्र का जप करना चाहिए :-
” ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराए सर्वशत्रुसंहार नाय , सर्वरोग हराए सर्ववशीकरणए
रामदुताए स्वाहा । ”

हिंदू पौराणिक कथाओं में हनुमान जी के अनेक युद्धों का वर्णन है । हनुमान जी के प्रत्येक युद्ध में उनकी अपार शक्ति और तीव्र बुद्धि के दर्शन होते हैं । अपनी शक्ति और बुद्धि से ही हनुमान जी बुराई पर विजय प्राप्त करते रहे हैं । हनुमान जी को विभीषण ने सतर्क करते हुए कहा कि इंद्रजीत के मारे जाने के बाद रावण ने अपने भाई अहिरावण से हाथ मिला लिया है । किसी अनहोनी की संभावना के साथ विभीषण ने हनुमान जी से भगवान राम और लक्ष्मण की कुटिया की रक्षा करने के लिए कहा । विभीषण ने ही हनुमान जी को बताया कि अहिरावण मायावी है । वह छल से भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को नुकसान पहुंचा सकता है । अहिरावण ने विभीषण की आशंका के अनुसार ऐसा ही किया और विभीषण का भेष बनाकर कुटिया में प्रवेश करना चाहा । अपने कर्तव्य पर डटे हुए हनुमान जी ने अहिरावण के छल को पहचान लिया और उसे ऐसा नहीं करने दिया । तब अहिरावण ने अपनी तंत्र विद्या से सबको गहरी नींद में सुलाकर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण जी का अपहरण कर लिया ।

अपने आराध्य की रक्षा के लिए पंचमुखी हनुमान जब पाताल लोक के द्वार के समीप पहुंचे तब उनका पुत्र मकरध्वज उनके सामने आकर उन्हें युद्ध के लिए ललकारने लगा । अति बलशाली मकरध्वज को हनुमान जी ने युद्ध में पराजित कर पाताल लोक में प्रवेश किया । ऐसा प्रसंग भी मिलता है कि हनुमान जी ने अपने आराध्य प्रभु श्रीराम की पांच प्रकार से पूजा की थी । इन पांच प्रकारों में :- नमन अर्थात श्रद्धा से प्रभु का नाम जपना । स्मरण अर्थात हर समय अपने आराध्य की स्मृति बनाए रखना । कीर्तनम अर्थात सर्व शक्तिमान ईश्वर की स्तुति करना । यचनम अर्थात गहरी आस्था के साथ निः स्वार्थ प्रार्थना करना तथा अर्पणम अर्थात स्वयं को ईश्वर के लिए अर्पित कर देना । इन्हीं पांच प्रकार की पूजा ने हनुमान जी को पंचमुखी अवतार ले पाने का आशीर्वाद प्रदान किया । आज हनुमान प्रकटोत्सव के अवसर पर हनुमान जी के प्रत्येक भक्त को ऐसी प्रतिज्ञा लेने की जरूरत है कि वे हनुमान जी के स्वभाव के अनुसार अपने आदरणीय जनों के प्रति उचित भावना को हृदय में स्थान प्रदान करेंगे । यही सच्ची हनुमत सेवा हो सकती है ।