बिहार में बाढ़ का पानी उतरने लगा, लेकिन दर्द बरकरार, घर लौटकर फिर जिंदगी बसाने की चुनौती

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पटना। बिहार में कई जगहों पर नदियों का जलस्तर धीरे-धीरे घटने लगा है, लेकिन बाढ़ प्रभावित परिवारों की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। हजारों परिवार अब भी तंबू और तिरपाल के सहारे खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। गांवों में पानी घुसने के बाद जरूरी सामान लेकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचे लोगों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल है कि पानी उतरने के बाद जब वे घर लौटेंगे तो वहां क्या बचेगा और जिंदगी को दोबारा कैसे पटरी पर लाएंगे।मुंगेर जिला मुख्यालय में पार्क और कलेक्ट्रेट कार्यालय के सामने कई बाढ़ प्रभावित परिवार तंबू-तिरपाल लगाकर रह रहे हैं। छोटे-छोटे तंबुओं में बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक दिन-रात गुजार रहे हैं। कई परिवार अपने मवेशियों को भी साथ लेकर आए हैं। ग्रामीणों के लिए मवेशी सिर्फ पशु नहीं, बल्कि उनकी रोजी-रोटी का महत्वपूर्ण साधन हैं।

पटना के मरीन ड्राइव पर भी बाढ़ प्रभावित परिवारों ने अस्थायी ठिकाना बनाया है। प्रभावित लोगों का कहना है कि घर में पानी घुसने के बाद जरूरी सामान लेकर किसी तरह सुरक्षित स्थान पर पहुंचे हैं। अब चिंता इस बात की है कि पानी उतरने के बाद घर की स्थिति क्या होगी। घर की सफाई, मरम्मत और परिवार को दोबारा बसाना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी।बाढ़ प्रभावित परिवारों की परेशानी सिर्फ रहने तक सीमित नहीं है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई है, घर में रखा सामान खराब होने की चिंता है और मवेशियों के लिए चारे का इंतजाम करना भी मुश्किल हो रहा है। तिरपाल के नीचे रहना भी आसान नहीं है। बारिश में तंबू में पानी आने, तेज हवा में तिरपाल उड़ने और रात में जहरीले जीव-जंतुओं के खतरे के बीच छोटे बच्चों और बुजुर्गों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।

प्रभावित लोगों का कहना है कि नदी का पानी उतरने के बाद उनकी असली चुनौती शुरू होगी। जिन घरों में कभी बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब कीचड़ और गंदगी जमा है। कई घरों की दीवारें कमजोर हो गई हैं। अनाज और घरेलू सामान पानी और नमी से खराब हो चुके हैं। किसानों की फसल बर्बाद हुई है, जबकि मवेशियों के सामने चारे का संकट खड़ा हो गया है।पानी उतरने के बाद लोगों को घरों की सफाई और मरम्मत के साथ अपनी रोजी-रोटी भी दोबारा शुरू करनी होगी। फसल बर्बाद होने से किसानों के सामने अगली फसल के लिए पूंजी जुटाने की चुनौती होगी। मजदूरों के लिए रोजगार का संकट खड़ा हो सकता है। वहीं, बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है। जलजमाव और दूषित पानी के कारण डायरिया, टाइफाइड, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है।

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14 जिलों में 40.21 लाख लोग प्रभावित

आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, विभिन्न नदियों के जलस्तर में वृद्धि के कारण बिहार के 14 जिलों में बाढ़ का असर पड़ा है। पटना, भोजपुर, सारण, वैशाली, भागलपुर, बेगूसराय, बक्सर, समस्तीपुर, मुंगेर, कटिहार, लखीसराय, खगड़िया, पूर्णिया और अरवल के 84 प्रखंडों की 514 ग्राम पंचायतों में करीब 40.21 लाख आबादी प्रभावित हुई है।नदियों का पानी भले ही अब धीरे-धीरे उतर रहा हो, लेकिन बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए संकट अभी खत्म नहीं हुआ है। तंबू हटेंगे, लोग घर लौटेंगे, लेकिन टूटे घरों को फिर से खड़ा करना, खेतों को तैयार करना, मवेशियों को बचाना और बच्चों की पढ़ाई को पटरी पर लाना उनके सामने लंबी चुनौती होगी। बाढ़ का पानी उतर रहा है, लेकिन प्रभावित परिवारों का संघर्ष अभी जारी है।