करुणा व्यंग्य की आत्मा होती है-डॉ माणिक विश्वकर्मा

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व्यंग्य के माध्यम से समाज, राजनीति, व्यक्ति या व्यवस्था की कमियों, कुरीतियों ,पाखंडों, विसंगतियों,नाकामियों एवं धर्म, संस्कृति व रोजमर्रा जीवन में मौजूद दोहरे मानदंडों व आडंबरों पर लक्षणा एवं व्यंजना के माध्यम से प्रहार किया जाता है। जीवन में फैली अनैतिकता, रूढ़िवादिता, जड़ता, भ्रष्टाचार एवं बेंग को उजागर किया जाता है। व्यंग्य का उद्देश्य मनोरंजन करना नहीं बल्कि समाज में व्याप्त बुराई में सुधार लाना होता है। एक उत्कृष्ट व्यंग्य के मूल में मानवता के प्रति गहरी सहानुभूति छिपी होती है। कोई भी लेखक या कवि एक सफल व्यंग्यकार तभी बन सकता है जब उसमें तीक्ष्ण अवलोकन दृष्टि, निडरता और निष्पक्षता, भाषा पर जबरदस्त पकड़, गहन सामाजिक और राजनैतिक समझ तथा मन में सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, संयमशीलता और संवेदनशीलता की भावना हो। हिन्दी साहित्य में व्यंग्य का प्रणेता संत कबीर को माना जाता है। उन्होंने मध्यकाल में जाति भेद, हिन्दू-मुसलमान के धर्माडंबर, गरीबी-अमीरी एवं रुढ़िवादिता आदि पर तीखा प्रहार किया है। कबीर के व्यंग्य बड़े मारक होते हैं। यथा काँकर पाथर जोरि के, मस्जिद लई चुनाय। ता चढ़ि मुल्ला बागि दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ।। जैसे अनेक उद्धरण कबीर की व्यंग्य क्षमता के जीवंत प्रमाण हैं। यूरोप में दांते द्वारा लेटिन में लिखी गयी किताब डिवाइन कॉमेडी को मध्यकालीन व्यंग्य का महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। जिसमें तत्कालीन व्यवस्था की पोल खोली गई थी। कवीर के बाद भारतेंदु ने सामाजिक विसंगतियों के प्रति व्यंग्य को हथियार बनाया और अंग्रेजों के खिलाफ लिखा कि होय मनुष्य क्यों भये, हम गुलाम वे भूप। प्रेमचंद ने युगीन समस्याओं पर आधारित कहानियों एवं उपन्यासों में आम आदमी और कृषकों की कठनाइयों पर तथा निराला ने अपने 1943 में प्रकाशित कविता संग्रह कुकुरमुत्ता में व्यंग्य की अभिव्यक्ति का प्रयोग किया है। कुकुरमुत्ता शोषित वर्ग और पूंजीपति वर्ग के बीच के संघर्ष का एक जीवंत दस्तावेज है आजादी के बाद राजनीतिक अदूरदर्शिता एवं निरंकुशता के कारण हुए सामाजिक नैतिक मूल्यों के पतन, शोषण- अत्याचार एवं भष्टाचार के विरुद्ध व्यंग्य लेखन की स्थायी परंपरा ने जन्म लिया। हरिशंकर परसाई को इस परंपरा का प्रतिनिधि व्यंग्यकार माना जाता है। उन्होंने हिंदी साहित्य में व्यंग्य को समाज के व्यापक और गंभीर प्रश्नों से जोड़ा तथा इसे सर्वोच्च विधा के रूप में स्थापित किया। व्यंग्य में बात को कलात्मक ढंग से इस प्रकार कहा जाता है कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। व्यंग्य की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले लोगों में शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, नरेन्द्र कोहली, के.पी. सक्सेना एवं डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी सहित अनेक लोगों के नाम शामिल हैं। व्यंग्य को सामाजिक सतर्कता के हथियार के रूप में देखा जाता है। व्यंग्य वही सार्थक माना जाता है जिसका सरोकार जीवन से होता है, जो जनता के पक्ष में खड़ा होता है और ऐसे कारकों का विरोध करता है जो सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों के विरुद्ध काम करते हैं। व्यंग्य में बात को कलात्मक ढंग से इस प्रकार कहा जाता है कि साँप भी मर जाज और लाठी भी न टूटे। व्यंग्य की पहली शर्त करुणा होती है दूसरे शब्दों में कहें तो करुणा की कोख से व्यंग्य जन्म लेता है जिस तरह बीज के अंकुरित होने के लिए नमी आवश्यक होती है उसी तरह व्यंग्य की उपज के लिए मन में करुणा का भाव आवश्यक होता है। क्योंकि जब कोई व्यंग्यकार किसी के दुख और मजबूरी को देखता है, तो उसके भीतर गहरी करुणा जागती है। जब उसमें उसे सुधार की गुंजाइश नहीं दिखाई देती तो उसका दर्द व्यंग्य के रूप में बाहर आता है और समाज सुधार का सशक्त माध्यम बनता है। संक्षेप में कहें तो, करुणा व्यंग्य की आत्मा होती है। व्यंग्यकार का लक्ष्य चोट पहुंचाना नहीं, बल्कि उस चोट की ओर ध्यान खींचना होता है जो समाज पहले से झेल रहा है। व्यंग्य ऐसी विधा है जिसमें हर विधा उपस्थित रहती है। एक संपूर्ण व्यंग्य में निबंध, नाटक, कविता एवं कथा सभी के तत्व दिखाई देते हैं। स्वार्थ सिद्धि के लिए लिखा गया व्यंग्य चाटुकारित की श्रेणी में आता है। साहित्य यदि समाज का दर्पण होता है तो व्यंग्य दूरबीन एवं टेलीस्कोप चुटकुलाबाजी एवं सपाट बयानबाजी को व्यंग्य की श्रेणी में नहीं रखा जाता। + व्यंग्य लिखते समय किसी भी व्यंग्यकार को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कही उसके द्वारा लिखे गए व्यंग्य में व्यंग्य के नाम पर ताना, मजाक, निंदा और छींटाकशी के तत्व तो नहीं सम्मिलित हो गये हैं। श्रेष्ठ व्यंग्य वही है जो पाठक को पहले हंसाए, लेकिन हंसने के तुरंत बाद उसे सोचने पर मजबूर कर दे।