रायपुर। छत्तीसगढ़ में चिमनियों से निकलता धुआं सिर्फ औद्योगिक विकास की कहानी नहीं कह रहा, बल्कि मजदूरों की सुरक्षा पर उठते गंभीर सवालों का गवाह भी है। पिछले तीन वर्षों में प्रदेश के कारखानों में 296 मजदूरों की मौत और 248 के घायल होने के आंकड़े डराने वाले हैं। हाल ही में सक्ती के वेदांता पावर प्लांट में हुए हादसे ने एक बार फिर 2009 के उस ‘बालको कांड’ की जख्मों को कुरेद दिया है, जिसमें 40 मजदूरों ने अपनी जान गंवाई थी।
इतिहास दोहरा रहा है, लापरवाही की दास्तां:
प्रदेश का औद्योगिक इतिहास खून से सना है। 2006 में बलौदाबाजार के रियल इस्पात में 7 मौतें हों या 2025 में सिलतरा (रायपुर) के गोदावरी स्टील में छत गिरने से गई 6 मजदूरों की जान हर बार जांच का भरोसा मिला, पर सुरक्षा मानक नहीं सुधरे। साल 2024 और 2026 की शुरुआत भी हादसों से भरी रही, जहाँ भिलाई स्टील प्लांट (BSP) से लेकर बेमेतरा की ब्लास्ट फैक्ट्री तक, मौत का तांडव जारी रहा।
आंकड़ों की जुबानी, हकीकत की कहानी:
विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ के 7,324 कारखानों में से 948 ‘खतरनाक’ और 32 ‘अत्यंत खतरनाक’ श्रेणी में हैं। सरकार कागजों पर पीपीई किट और सेफ्टी ऑडिट की बात तो करती है, लेकिन हकीकत यह है कि मुनाफे की होड़ में मजदूरों की जिंदगी को दांव पर लगा दिया जाता है। क्या औद्योगिक विकास की कीमत मजदूरों की बलि देकर चुकाई जाएगी? वेदांता हादसे के बाद श्रमिक संगठनों ने फिर मोर्चा खोला है। मांग सिर्फ जांच की नहीं, बल्कि उन दोषियों को सजा देने की है जो चंद रुपयों की बचत के लिए सुरक्षा मानकों को ताक पर रख देते हैं।
