छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का दसवां प्रांतीय सम्मेलन बेमेतरा में संपन्न

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छत्तीसगढ़ी भाषा के संरक्षण, संवर्धन, मानकीकरण और वृहद शब्दकोश निर्माण पर हुआ गंभीर विमर्श

बेमेतरा। छत्तीसगढ़ की लोकभाषा, साहित्य, कला और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन को समर्पित छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का दो दिवसीय दसवां प्रांतीय सम्मेलन-2026 बेमेतरा में गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। 26 और 27 सितंबर को कवर्धा रोड स्थित निजी होटल में आयोजित सम्मेलन में प्रदेशभर के साहित्यकारों, भाषाविदों, विद्वानों, संस्कृति कर्मियों और राजभाषा प्रेमियों ने भाग लिया।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में दुर्ग लोकसभा क्षेत्र के सांसद विजय बघेल मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी लोकभाषा, लोककला, साहित्य और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं से निर्मित हुई है। मातृभाषा का संरक्षण और उसका संवर्धन समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

सम्मेलन में छत्तीसगढ़ शासन के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उपमुख्यमंत्री अरुण साव, सांसद विजय बघेल तथा अन्य जनप्रतिनिधियों की आभासी एवं वैचारिक सहभागिता रही। मंच पर खेल एवं युवा कल्याण मंत्री राजेश अग्रवाल, खाद्य नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री दयालदास बघेल तथा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा सहित आयोग के पदाधिकारी और साहित्यिक क्षेत्र से जुड़े प्रमुख लोग उपस्थित रहे।

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सम्मेलन के दौरान छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास, उसके शासकीय एवं व्यावहारिक प्रयोग को बढ़ावा देने, क्षेत्रीय बोलियों के संरक्षण तथा भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा हुई। आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा ने कहा कि छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाना आयोग के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। उन्होंने भाषा के व्यापक विकास के लिए भावी कार्ययोजनाओं और विभिन्न स्तरों पर किए जाने वाले प्रयासों की आवश्यकता रेखांकित की।

सम्मेलन में साहित्यिक एवं भाषायी विषयों पर विभिन्न सत्र आयोजित किए गए। इसी क्रम में दूसरे दिन ‘छत्तीसगढ़ी व्याकरण, मानकीकरण एवं वृहद शब्दकोश निर्माण विषय पर विशेष विचार-विमर्श हुआ। सत्र में छत्तीसगढ़ी शब्दकोश निर्माण की परंपरा, भाषा के मानकीकरण तथा भविष्य में वृहद शब्दकोश तैयार करने की जरूरत पर विस्तार से चर्चा की गई।

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साहित्यकार डॉ. देवधर महंत ने कहा कि छत्तीसगढ़ी में शब्दकोश निर्माण की परंपरा पुरानी है। उन्होंने बताया कि प्रारंभिक शब्दकोशों में रेवरेंड ई. जी. मेंजेल द्वारा 1939 में प्रस्तुत ‘ए लिस्ट ऑफ मोस्ट छत्तीसगढ़ी कॉमन वड्र्स एंड डिक्शनरी का उल्लेख मिलता है। इसके बाद अनेक विद्वानों ने छत्तीसगढ़ी की शब्द-संपदा को संकलित और व्यवस्थित करने का कार्य किया।

डॉ. महंत ने छत्तीसगढ़ी शब्दकोश निर्माण की इस परंपरा में डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा के योगदान को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. शर्मा का वृहद शब्द-संग्रह उनके उस शोधकार्य पर आधारित है, जिसे उन्होंने 1972 में पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर से पी-एच.डी. की उपाधि के लिए प्रस्तुत किया था। उनके शोधप्रबंध का विषय ‘छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन की शब्दावली था।

उन्होंने कहा कि डॉ. शर्मा ने कृषक जीवन से जुड़े हजारों शब्दों को संकलित करने के साथ उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषायी संदर्भों को भी समझने का प्रयास किया। इस कारण उनका कार्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं रह जाता, बल्कि छत्तीसगढ़ के कृषि-जीवन, लोक-संस्कृति और सामाजिक स्मृति का महत्वपूर्ण भाषायी दस्तावेज बन जाता है।

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डॉ. महंत ने कहा कि छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण के लिए ऐसे वृहद शब्दकोश की आवश्यकता है, जिसमें प्रदेश के विभिन्न अंचलों में प्रचलित शब्दों के अर्थ, प्रयोग, पर्याय और सांस्कृतिक संदर्भ व्यवस्थित रूप से दर्ज हों। इस दिशा में डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा का कार्य भविष्य के शब्दकोश निर्माण के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर सकता है।

विचार-विमर्श सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात भाषाविद् डॉ. चित्तरंजन कर ने डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा के भाषायी अवदान को रेखांकित करते हुए कहा कि वे छत्तीसगढ़ी के अधिकारी विद्वान और भाषाविद् थे। उनके अनुसार डॉ. शर्मा ने गहन अध्ययन, व्यापक क्षेत्र-अनुभव और दीर्घ अध्यवसाय के आधार पर छत्तीसगढ़ी की शब्द-संपदा को संकलित किया। उनका तैयार किया गया शब्दकोश छत्तीसगढ़ी भाषा के अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और श्रेष्ठ शब्दकोशों में उसका स्थान है।

सम्मेलन में साहित्य और भाषा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले रचनाकारों एवं विद्वानों का सम्मान भी किया गया तथा विभिन्न साहित्यिक कृतियों का विमोचन हुआ। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अतिथियों का स्वागत किया गया।

दो दिवसीय सम्मेलन में हुए विमर्श का केंद्रीय स्वर यह रहा कि भाषा का संरक्षण केवल उसके साहित्यिक प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके शब्दों, बोलियों, व्याकरण, लोकप्रयोगों और सांस्कृतिक संदर्भों का दस्तावेजीकरण भी उतना ही आवश्यक है। वक्ताओं ने कहा कि शब्दकोश किसी भाषा के शब्दों का मात्र संकलन नहीं होता; वह समाज के लोकजीवन, संस्कृति और सामूहिक स्मृति को सुरक्षित रखने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज भी होता है। सम्मेलन के समापन अवसर पर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पदाधिकारियों ने आयोजन में सहभागी साहित्यकारों, भाषाविदों, अतिथियों, सहयोगियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।