महा-संयोग: 16 मई को आस्था का त्रिवेणी संगम, वट सावित्री व्रत, शनि जयंती और ज्येष्ठ अमावस्या एक साथ

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भीषण गर्मी के बीच आगामी 16 मई का दिन श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और अगाध श्रद्धा का अनूठा उपहार लेकर आ रहा है। इस बार ज्येष्ठ अमावस्या पर वट सावित्री व्रत और शनि जयंती का ऐसा दुर्लभ संयोग बन रहा है, जो सौभाग्य, कर्म और पितृ कृपा को एक साथ जोड़ेगा। इस पावन दिन पर सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखद दांपत्य जीवन के लिए वट सावित्री का कठिन व्रत रखेंगी। सोलह श्रृंगार से सजी महिलाएं वट वृक्ष (बरगद) की पूजा कर, उसमें रक्षासूत्र बांधकर परिक्रमा करेंगी और मंगलगीत गाएंगी। यह व्रत माता सावित्री के उस दृढ़ संकल्प की याद दिलाता है, जिन्होंने यमराज से भी अपने पति सत्यवान के प्राण वापस छीन लिए थे।

इसी दिन अमावस्या पर शनि जयंती का होना इस पर्व के महत्व को कई गुना बढ़ा रहा है। शनि दोष से मुक्ति और कष्टों के निवारण के लिए भक्त इस दिन पीपल के पेड़ की विशेष पूजा करेंगे और शनिदेव को तेल, काले तिल, उड़द व वस्त्र अर्पित कर दान-पुण्य करेंगे। इसके साथ ही, यह तिथि पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए भी सर्वोत्तम मानी गई है। श्रद्धालु पवित्र स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख कर तिल, कुश और जल से पितृ तर्पण करेंगे, जिससे पितरों का आशीर्वाद मिले और घर में सुख-समृद्धि का वास हो।

विशेष फल: इस दिव्य योग में ॐ नमः शिवाय’, ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ और गायत्री मंत्र का जाप अक्षय पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है। आस्था और परंपरा का यह अद्भुत संगम हर श्रद्धालु के जीवन में खुशहाली और आध्यात्मिक चेतना का संचार करेगा।