आधुनिकता, भोग विलासिता, और सुख सुविधाओं में रची बसी जीवन शैली की देन है सेप्टिक टंकी। शहर तो शहर अब तो गांव-गांव में घर घर में सेप्टिक टैंक ने अपनी जगह बना ली है, किंतु मल मूत्र का यह गड्ढा चुपके-चुपके मानव मौत का गड्ढा भी बनता जा रहा है। जीते जागते इंसान को बरमुड़ा ट्रेंगल की तरह निगल ले रहा है। हाल ही में (17 मार्च की रात साढ़े आठ बजे) राजधानी रायपुर के रामकृष्ण केयर हास्पिटल में निर्मित अंडरग्राउंड सीवरेज- गटर (विशाल सेप्टिक टैंक) की सफाई हेतु उतरे तीन युवा सफाई मजदूरों की मौत हो गई। इस घटना ने सबको चौंका दिया साथ ही अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रोविजन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एस मैन्युअल स्क्वैंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013 के अंतर्गत सीवरेज गटर की सफाई मानव बल से करवाना पूर्णत: प्रतिबंधित है। इसके बावजूद सेफ्टी कास्ट्यूम और साधनों के बिना गहरे मलबा भरे टैंक में सफाई हेतु उतरना तो आ बैल मुझे मार की तरह ही बात हुई। इसके पूर्व ऐसी ही घटना अशोक बिरयानी रायपुर में हो चुकी है। तब भी भयंकर बवाल मचा था। पब्लिक- प्रेस-और पुलिस प्रशासन को हिलाकर रखने वाली उसी घटना की पुनरावृत्ति हो गई। तीन मजदूरों को ही नहीं उनके परिवार जनों की उम्मीदों और सपनों को भी सीवरेज चैंबर निगल गया। इस भयावह घटना ने फिर से बता दिया है कि सेप्टिक टैंक में उतरने वाले लोग जरूरतमंद गरीब मजदूर ही होते हैं। सेप्टिक टैंक में उन्हें उतारने वाले लोग धनाढ्य ‘हाई स्टेटसÓ के लोग होते हैं। दोनों में बेसिक डिफरेंस यही होता है कि एक सेप्टिक टैंक को भरता है, दूसरा टैंक को खाली करता है। स्विमिंग पूल में भी सेफ्टी कॉस्ट्यूम के साथ उतरने वाले आमिर धनाढ्य लोग गरीबों को सेप्टिक टैंक में उतारते समय सेफ्टी साधन मुहैया कराने के बारे में सोचना भी भूल जाते हैं। दरअसल गरीब की जान आज भी सस्ती है। दुर्भाग्य है कि छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा उन्नत विकसित हॉस्पिटल जो दूसरों की प्राण रक्षा के लिए जाना जाता है। उसी अस्पताल प्रबंधन के नाक के नीचे जान पर खेलते हुए गटर में उतरते मजदूरों की जान की परवाह कैसे किसी ने नहीं की। पूर्व में घटित घटनाओं से कोई सीख लिए बिना मैनुअल स्कैवेंजिग जैसी लापरवाही और भी अनेक संस्थाओं कार्यालयों में हो रही होगी। ऐसी दु:खद घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक है कि सेप्टिक टैंकों की जांच अनिवार्यता वर्ष में एक बार सरकारी तौर पर होनी चाहिए। नगर निगम प्रबंधन को चाहिए कि वह बड़े संस्थानों के सेप्टिक टैंको की टाइम टू टाईम सशुल्क सफाई की जिम्मेदारी स्वयं ले। हाई प्रेशर जेटिंग मशीन की उपलब्धता सुनिश्चित करे। नवनिर्मित कॉलोनियों में सेप्टिक टैंक के लिए खोदे गए गड्ढे खुला छोड़ दिए जाते हैं। अनेक निजी और सरकारी कॉलोनियों में चैंबर खुले होते हैं। चैंबर का कव्हर टूटने की कगार पर होता है। जिसमें मनुष्यों -पशुओं के गिर जाने की प्रबल संभावना रहती है। आम नागरिकों को भी चाहिए कि स्वयं के घर में बने सेप्टिक टैंक- चैंबर के कव्हर की जांच करते रहें। जंग लग चुके चैंबर को बदल दें। विदित हो कि हाल ही में रायपुर के अमलीडीह क्षेत्र में निर्माणाधीन मकान की खुली टंकी में डेढ़ वर्ष का बच्चा डूब गया था। मोवा में भी सेप्टिक टैंक में गिरने से बच्ची की मौत हुई थी, अत: घरों में भी विशेष सावधानी आवश्यक है। कहते हैं मौत बताकर नहीं आती है लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में मौत तो साक्षात खड़ी थी,अत: कहना होगा कि उसे अनदेखी करके दुस्साहस दिखाने की भूल का खामियाजा मृतकों को और अब उनके परिजनों को भोगना पड़ रहा है। महासंकट की ऐसी घड़ी में रामकृष्ण केयर प्रबंधन ने मृतकों के परिवार को वित्तीय मुआवजा, पेंशन परिवार का इलाज और बच्चों की पूर्ण शिक्षा की जिम्मेदारी ली। साथ ही मृतकों के निकट संबंधियों के लिए चिकित्सा बीमा के माध्यम से आजीवन स्वस्थ कवरेज देने की सहमति दी है। इसे नि:संदेह बेहतरीन पहल कह सकते हैं। मैनुअल स्कैवेजिंग जैसी अमानवीय प्रथा को रोकने के लिए आम नागरिकगण भी अपनी जागरूकता का परिचय दें। अवैधानिक रूप से की जा रही ऐसी सफाई की जानकारी नगर निगम हेल्पलाइन नंबर 14420 और निदान- 1100 कलेक्टर कॉल सेंटर पर दे सकते हैं।
सेप्टिक टैंक है स्वीमिंगपूल नहीं – विजय मिश्रा
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