जड़ों की ओर: सुपरफूड्स का चलन बनाम भारतीय आहार परंपराएँ
रायपुर। किसी भी हेल्थ फ़ूड साइट या पत्रिका को खोलिए, आपको वही डाइट प्लान मिलेगा: एवोकाडो टोस्ट, चिया और क्विनोआ बाउल, केल स्मूदी वगैरह। इन व्यंजनों में ज़्यादातर आयातित सामग्री इस्तेमाल होती है, जिसे हमें बेहतरीन सेहत के पासपोर्ट की तरह बेचा जाता है। इनकी क़ीमत अक्सर इतनी ज़्यादा होती है कि एक व्यक्ति के लिए भी भारी पड़े, पूरे परिवार की तो बात ही क्या।
इस बीच, जिस पोषण के लिए उपभोक्ता ऊँची क़ीमतें चुका रहे हैं, उसका बड़ा हिस्सा पहले से हमारी रसोई की अलमारियों में मौजूद है। पिछली पीढ़ियाँ जो चीज़ें रोज़ खाती थीं, उनमें से ज़्यादातर नए सुपरफूड्स जितनी ही गुणकारी हैं, और कई मायनों में हमारे स्वाद, हमारी रसोई और हमारे बजट के ज़्यादा अनुकूल भी हैं।
सुपरफूड का मिथक
‘सुपरफूड’ एक मार्केटिंग शब्द है, वैज्ञानिक शब्द नहीं। कोई एक सामग्री अकेले आपकी सेहत की रक्षा नहीं कर सकती। असली सवाल यह है कि आपका समग्र आहार फाइबर, प्रोटीन, स्वस्थ वसा, विटामिन और खनिजों से भरपूर है या नहीं, और उसमें प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ तथा refined चीनी कम है या नहीं।
इस कसौटी पर देखें तो एक सामान्य पारंपरिक भारतीय थाली काफ़ी अच्छा प्रदर्शन करती है।
मिलेट्स: लगभग भुला दिए गए प्राचीन अनाज
पॉलिश किए हुए सफ़ेद चावल और मैदे के आने से पहले देश में मिलेट्स का ही बोलबाला था। रागी (फिंगर मिलेट), बाजरा (पर्ल मिलेट), ज्वार (सोरघम) और कंगनी (फॉक्सटेल मिलेट) फाइबर से भरपूर हैं और इन्हें कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। रागी कैल्शियम का एक पादप-आधारित स्रोत है, जबकि बाजरा आयरन से भरपूर है। मिलेट्स पॉलिश किए हुए अनाज की तुलना में धीरे पचते हैं, इसलिए ये ब्लड शुगर को स्थिर रखने में मददगार हो सकते हैं। मधुमेह के बढ़ते मामलों वाले हमारे देश में यह बहुत अहम है।
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क्विनोआ की लोकप्रियता बढ़ रही है और वह निस्संदेह एक अच्छा विकल्प है, लेकिन रागी या ज्वार का दलिया, या भाखरी (रोटी) वही फ़ायदे देते हैं, साथ ही ये ज़्यादा किफ़ायती हैं और स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध हैं।
दाल, दलहन और सत्तू: प्रीमियम क़ीमत के बिना प्रोटीन
बाज़ार में प्रोटीन पाउडर और आयातित प्रोटीन बार भरे पड़े हैं, लेकिन दाल, राजमा, चना या मूँग की एक थाली ने पीढ़ियों को पोषण दिया है। दलहन अपने आप में संपूर्ण आहार हैं, जो प्रोटीन, फाइबर और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं। इन्हें अक्सर अनाज के साथ खाया जाता है, जैसे चावल या रोटी के साथ दाल, जिससे संपूर्ण अमीनो एसिड प्रोफ़ाइल मिल जाती है।
एक और स्थानीय सुपरफूड सत्तू है, यानी भुने हुए चने का आटा, जो बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुख्य आहार है। इसे ठंडे पेय के रूप में पिया जा सकता है या रोटी/पराठे में मिलाया जा सकता है। यह किफ़ायती, प्रोटीन से भरपूर और पेट भरने वाला होता है।
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बीज, मेवे और वसा: चिया के स्थानीय विकल्प
चिया सीड्स ओमेगा-3 फैटी एसिड और फाइबर का बेहतरीन स्रोत हैं। लगभग ऐसे ही फ़ायदे अलसी, तिल, सरसों के दाने और मूँगफली से मिलते हैं, जो लंबे समय से भारतीय खान-पान का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। सर्दियों में तिल के लड्डू बनते हैं, जबकि महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में अलसी की चटनी बनती है, जिसे थोड़े गुड़ या चीनी के साथ चबाकर खाया जाता है। मखाना (फॉक्स नट) कम वसा वाला स्नैक है और ज़्यादातर पैकेटबंद चिप्स से कहीं सेहतमंद है।
हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ: केल से आगे
केल के आने से बहुत पहले से भारतीय रसोई में कई तरह के साग बनते आए हैं, जैसे पालक, मेथी, सरसों, लाल साग (चौलाई) और सहजन के पत्ते। अलग-अलग तरह के साग देश के हर क्षेत्र में और बंगाली व्यंजनों में भी खूब इस्तेमाल होते हैं।
साग आयरन, फोलेट, विटामिन A और K तथा एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं। इन पत्तेदार सब्ज़ियों का, जिनमें कैल्शियम और आयरन दोनों होते हैं, अधिकतम लाभ पाने के लिए इन्हें पारंपरिक विधि से थोड़े तेल या घी में पकाइए।
फर्मेंटेड और ठंडक देने वाले खाद्य पदार्थ: पारंपरिक तरीक़े से पेट की सेहत
प्रोबायोटिक योगर्ट के विकल्पों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है, लेकिन किण्वन (फर्मेंटेशन) भारतीय भोजन का सदियों पुराना हिस्सा रहा है। इडली और डोसा का घोल, दही, छाछ, कांजी और पंता भात (रातभर खमीर उठाया हुआ चावल, जो पश्चिम बंगाल और ओडिशा में लोकप्रिय है) उत्कृष्ट पारंपरिक प्रोबायोटिक हैं। भोजन के साथ सादा दही और छाछ लेना पेट की सेहत के लिए फ़ायदेमंद माना जाता है।
मसाले और फल: रोज़मर्रा की दवाई की पिटारी
भारतीय रसोई में मसालों की भरमार होती है। हल्दी, अदरक, जीरा, अजवाइन, मेथी और हींग भोजन को अलग-अलग स्वाद देते हैं। इनके औषधीय गुणों पर अब वैज्ञानिक शोध भी बढ़ रहा है। आँवला विटामिन C का एक किफ़ायती और प्राकृतिक स्रोत है, और अमरूद, जामुन और पपीता जैसे मौसमी फल ढेरों पोषक तत्व देते हैं, वह भी ‘आयातित’ के ठप्पे के बिना। मसाले और फल अच्छे पोषण के पूरक हैं, इलाज या उचित देखभाल का विकल्प नहीं।
एक संतुलित पारंपरिक थाली कैसी दिखती है
भारतीय थाली का पुराना नियम आज भी खरा उतरता है। एक संतुलित थाली में शामिल होते हैं:
● एक साबुत अनाज या मिलेट
● एक दाल, दलहन या फलियाँ
● एक-दो मौसमी सब्ज़ियाँ, जिनमें साग भी हो
● दही या छाछ
● स्वस्थ वसा की थोड़ी मात्रा
● मछली, अंडे या लीन मीट, जो इन्हें खाते हैं उनके लिए
स्थानीय, मौसमी और कम प्रोसेस्ड भोजन पर आधारित यही विविधता है, जिसकी सिफ़ारिश आधुनिक पोषण विज्ञान भी करता है।
भारतीय थाली: एक ही प्लेट में संपूर्ण पोषण
भारतीय थाली सिर्फ़ एक भोजन नहीं, एक संतुलित प्लेट है। चावल या रोटी से ऊर्जा मिलती है, दाल से प्रोटीन, सब्ज़ियों से रेशा और विटामिन मिलते हैं, दही पेट की सेहत में मदद करता है, और थोड़ा-सा घी या तेल शरीर को ज़रूरी वसा देता है। सलाद, अचार और थोड़ी-सी मिठाई खाने में स्वाद और विविधता जोड़ते हैं। ये साधारण चीज़ें जब साथ खाई जाती हैं, तो शरीर की रोज़ की ज़्यादातर ज़रूरतें पूरी हो जाती हैं। मौसमी चीज़ों से बनी और सही मात्रा में खाई गई थाली हमारे रोज़ के खान-पान में संपूर्ण पोषण है।
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आगे का रास्ता: परंपरा
आयातित भोजन अपने आप में बुरा नहीं है, और न ही पारंपरिक भोजन से परहेज़ करने की ज़रूरत है। आम घरों के पारंपरिक भोजन में refined चावल, नमक और तेल की मात्रा ज़्यादा हो सकती है, इसलिए मात्रा और पकाने का तरीक़ा अब भी मायने रखते हैं। साथ ही, खाने का सही तरीक़ा आपकी उम्र, आपके शरीर की स्थिति और आपकी स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरतों पर निर्भर करता है।
अच्छा आहार न तो विदेश से आई सबसे महँगी चीज़ें खरीदने का नाम है, और न ही विदेशी खाद्य पदार्थों की कोई सूची। एक अच्छा, संतुलित आहार वह है जो पौष्टिक, किफ़ायती, टिकाऊ और आनंददायक हो, और उसका ज़्यादातर हिस्सा हमारे पास अपने घरों में पहले से मौजूद है।
