लोकतंत्र और नागरिक -डॉ. माणिक विश्वकर्मा

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भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। स्वतंत्रता मिलने एवं संविधान लागू होने के बाद यह एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक गणराज्य बना। देश में आज 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक वयस्क नागरिक को वोट देने एवं नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी, समानता और धर्म मानने की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। देश में चार शक्तियों विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं मीडिया प्रजातंत्र की रक्षा करने एवं उसे मज़बूत बनाने निरंतर सक्रिय रहती हैं। निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग की व्यवस्था मौजूद है। लोकतंत्र केवल एक प्रणाली नहीं बल्कि जीवन जीने की पद्धति और सामाजिक एवं राजनीतिक मूल्यों का आईना होता है। यदि लोकतंत्र शरीर है तो संविधान आत्मा है। अब्राहम लिंकन के अनुसार लोकतंत्र जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन होता है। इस व्यवस्था का वास्तविक आधार एवं निर्माता नागरिक ही होता है। लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती एवं जीवंतता के लिए जरूरी है कि प्रत्येक नागरिक जागरूक, सक्रिय और राष्ट्र के लिए समर्पित हो। लोकतंत्र और नागरिक दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं। यदि लोकतंत्र नागरिकों को स्वतंत्रता, समता और गरिमा प्रदान करता है तो नागरिकगण अपनी सहभागिता, ईमानदारी एवं सहभाजिता से लोकतंत्र को संबल और जीवंतता प्रदान करते हैं। केवल देश की सीमा में रहने या पहचान पत्र प्राप्त करने से कोई भी नागरिक नहीं बन जाता। नागरिक कहलाने का वही व्यक्ति हकदार होता है जो किसी राज्य या राष्ट्र का पूर्ण, वैद्य और स्वायत्त सदस्य होता है। नागरिकता प्राप्त करने के लिए कुछ बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करना होता है उसमें राज्य के विचारों, चुनाव प्रक्रियाओं और नीति-निर्माण में भाग लेने का अधिकार, संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार, विधि और न्याय की प्राप्ति का कानूनी अधिकार, समाज और राष्ट्र के प्रति साझा कर्तव्यों, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करना शामिल होता है। लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका केवल मतदान करने तक सीमित न रहकर बहुआयामी होती है। निष्पक्ष और विवेकपूर्ण मतदान लोकतंत्र का सबसे पहला और प्राथमिक चरण होता है। सही उम्मीदवार और नीतियों का चुनाव ही शासन की दिशा तय करता है। प्रत्येक नागरिक का यह भी दायित्व होता है कि वह जन-सुनवाई, सुझाव-पत्रों, संवादों और प्रतिनिधियों से निरंतर संपर्क के माध्यम से जनहित की नीतियों के निर्माण में योगदान दे, सरकार के कामकाज, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक शिथिलता पर नज़र रखें क्योंकि सतत सतर्कता ही स्वतंत्रता की रक्षा का मूल मंत्र होता है। सूचना का अधिकार जैसे उपकरणों का प्रयोग करके पारदर्शिता और अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करना, विभिन्न धर्मों, भाषाओं, जातियों और संस्कृतियों के प्रति सहिष्णुता और बंधुत्व की भावना रखना, संविधान का सम्मान करना, सामाजिक सद्भाव बनाए रखना, युवाओं में राजनीति और चुनावी प्रक्रियाओं के प्रति बढ़ते असंतोष को दूर करना केवल प्रशासन और राजनेताओं का ही नहीं प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व होता है। युवाओं को आज ये समझाने की भी आवश्यकता है कि लोकतंत्र में अधिकार और कर्तव्य परस्पर जुड़े रहते हैं अधिकारों का प्रयोग करने के साथ ही अपने दायित्वों का निर्वहन भी सदैव देशहित में करते रहना चाहिए। अधिकार यदि व्यक्ति को स्वतंत्रता और अवसर प्रदान करते हैं तो कर्तव्य समाज में व्यवस्था और संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी होते हैं। अधिकार के अंतर्गत नागरिक को दी गई स्वतंत्रताएँ आती हैं तो कर्तव्य के अंतर्गत राष्ट्र और समाज के प्रति नागरिक की जिम्मेदारियाँ आती हैं। राष्ट्र की एकता, अखंडता, गरिमा सर्वांगीण विकास और शांति को बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होता है। जब नागरिक केवल अपने अधिकारों की मांग करता है और कर्तव्यों को भूल जाता है तब समाज में अराजकता फैलती है। आज भारतीय लोकतंत्र कई वैश्विक और आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, जो सीधे नागरिक जीवन को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में प्रत्येक नागरिक को सजग एवं सतर्क रहने की आवश्यकता है। उदाहरण के तौर पर जहाँ भ्रामक जानकारी और फेक न्यूज़ के जरिए नागरिकों को गुमराह किया जा रहा है वहीं चुनावों में अत्यधिक धन और बाहुबल का प्रयोग होने लगा है साथ ही जघन्य अपराधों के युवाओं को भड़काया जा रहा है। इससे देश में धुव्रीकरण और असहिष्णुता का वातावरण निर्मित हो रहा है। आज लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए जरूरी है कि हम विद्यालयों और कॉलेजों के स्तर पर केवल साक्षरता ही नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, कर्तव्यों और लोकतांत्रिक मूल्यों की व्यावहारिक शिक्षा भी देना आरंभ करें, सरकारी प्रक्रियाओं में अधिक से अधिक पारदर्शिता लाएँ ताकि भ्रष्टाचार कम हो और नागरिक आसानी से सेवाएं प्राप्त कर सकें। न्यायपालिका, चुनाव आयोग और मीडिया जैसी स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्ता और निष्पक्षता बनाए रखने में मदद करने वाले ऐसे गैर- सरकारी संगठनों, युवा समूहों और नागरिक मंचों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है जो जनहित के मुद्दों को उठाते हों। लोकतंत्र एक बार बनाकर छोड़ दिये जाने वाला ढांचा नहीं अपितु निरंतर चलने वाली प्रक्रिया और साधना है। इसकी सफलता एवं विफलता पूरी तरह उसके नागरिकों की चेतना, सहभागिता और विवेक पर निर्भर करती है। जब प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहते हुए अपने सामाजिक व राष्ट्रीय कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करने लगता है तब लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं रह जाता, बल्कि वह न्याय, समानता और मानवीय गरिमा का जीवंत प्रतीक बन जाता है।