किसी देश की आर्थिक ताकत का आकलन केवल उसकी जीडीपी की वृद्धि, शेयर बाजार की चमक या बैंकों के बढ़ते मुनाफे से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह है कि जब वित्तीय व्यवस्था पर संकट आए, तब सरकार और नियामक संस्थाएं उसे संभालने के लिए कितनी तैयार हैं। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता बोर्ड (एफएसबी) की समीक्षा में भारत की बैंकिंग व्यवस्था को लेकर जो सवाल उठे हैं, वे इसी कसौटी पर हमारी तैयारियों की पड़ताल करते हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि भारत के बैंक आज कितने मजबूत हैं, बल्कि यह भी है कि यदि कोई बड़ा बैंक कल संकट में फंस जाए, तो उसे संभालने के लिए हमारे पास ठोस और भरोसेमंद व्यवस्था है या नहीं। एफएसबी की समीक्षा में भारत और अर्जेंटीना का सार्वजनिक आपातकालीन फंडिंग व्यवस्था के मानकों पर पूरी तरह खरा न उतरना सामान्य प्रशासनिक कमी मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह वित्तीय सुरक्षा के उस ढांचे से जुड़ा सवाल है, जिसकी कमजोरी का पता अक्सर संकट आने के बाद ही चलता है। तब तक नुकसान इतना बढ़ चुका होता है कि सरकार के सामने बैंक को बचाने, जमाकर्ताओं का भरोसा कायम रखने और अर्थव्यवस्था को अस्थिर होने से रोकने के बीच मुश्किल चुनाव खड़े हो जाते हैं। बैंक डूबता है तो सिर्फ उसका मालिक नहीं हारता, पूरी अर्थव्यवस्था दांव पर लग जाती है। बैंक लोगों की बचत, कारोबार की पूंजी, उद्योगों के कर्ज और भुगतान व्यवस्था के केंद्र में होते हैं। किसी बड़े और परस्पर जुड़ी वित्तीय प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण बैंक की विफलता का असर उसके खाताधारकों तक सीमित नहीं रहता। दूसरे वित्तीय संस्थानों, बाजारों और कारोबारों तक उसका संक्रमण हो सकता है। ऐसे में बैंक को संकट से निकालने या व्यवस्थित तरीके से बंद करने की तैयारी किसी एक संस्थान की जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा की बुनियादी शर्त है। यहीं आपातकालीन तरलता और बैंक रेजोल्यूशन की व्यवस्था का महत्व सामने आता है। जब किसी बैंक के पास अचानक भुगतान करने के लिए पर्याप्त नकदी नहीं रहती और बाजार से भी धन जुटाने के रास्ते बंद होने लगते हैं, तब उसे अस्थायी सहायता की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन सहायता देने का मतलब यह नहीं कि बैंक के मालिकों और प्रबंधन की गलतियों की कीमत जनता चुकाए। एक मजबूत व्यवस्था का उद्देश्य जरूरी बैंकिंग सेवाओं को जारी रखते हुए संकटग्रस्त बैंक को किसी सक्षम खरीदार को सौंपना या उसे नियंत्रित तरीके से बंद करना होना चाहिए। इसमें जमाकर्ताओं का संरक्षण, वित्तीय प्रणाली की स्थिरता और सार्वजनिक धन के जोखिम को सीमित करना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत के लिए चिंता का विषय यही है कि इस तरह की आपात स्थिति में सहायता देने और विफल बैंक का व्यवस्थित समाधान करने के बीच पर्याप्त स्पष्टता तथा क्षमता कितनी है। संकट के समय केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि रिजर्व बैंक और सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। बाजार का भरोसा घोषणाओं से नहीं, तैयार व्यवस्था से बनता है। संकट के दौरान हर घंटे की देरी बैंक की मुश्किल बढ़ा सकती है। इसलिए यह पहले से तय होना चाहिए कि सहायता कौन देगा, किन शर्तों पर देगा, कितनी जल्दी देगा और अंततः उस सहायता का बोझ किस पर पड़ेगा। इस मामले में सरकार को एक बुनियादी अंतर भी स्पष्ट रखना होगा। तरलता की समस्या और दिवालियापन की समस्या एक जैसी नहीं होतीं। कोई बैंक अस्थायी नकदी संकट में हो तो सीमित अवधि की सहायता उसे संभालने का अवसर दे सकती है। लेकिन यदि उसकी संपत्तियों की वास्तविक कीमत देनदारियों से कम हो चुकी है, तो केवल सरकारी धन डालकर उसे जीवित रखना समस्या को आगे खिसकाना होगा। ऐसी स्थिति में नुकसान की पहचान, जिम्मेदारी तय करना और बैंक का व्यवस्थित समाधान करना जरूरी है। आपातकालीन फंडिंग को घाटे में चल रहे बैंक के लिए स्थायी जीवनदान में बदल देना सुधार नहीं, जोखिम को सार्वजनिक खजाने पर टालना है। यहां करदाताओं के पैसे का प्रश्न सबसे अहम हो जाता है। बैंकिंग संकट में सरकार के सामने अक्सर दो दबाव होते हैं–एक तरफ वित्तीय व्यवस्था को ढहने से बचाने की जरूरत और दूसरी तरफ जनता के धन की सुरक्षा। यदि समाधान का ढांचा कमजोर हो, तो बैंक बचाने के नाम पर सार्वजनिक धन झोंकने …की नौबत आ सकती है। नुकसान निजी फैसलों से पैदा हो, लेकिन उसकी भरपाई जनता करे, यह व्यवस्था न तो न्यायसंगत है और न ही बाजार में जिम्मेदार व्यवहार को प्रोत्साहित करती है। इसके उलट, यदि संकटग्रस्त बैंक को व्यवस्थित तरीके से संभालने के लिए पहले से नियम, संसाधन और अधिकार तय हों, तो सरकार को घबराहट में फैसले लेने की जरूरत कम पड़ेगी। एफएसबी की समीक्षा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि भारत इस संस्था का सक्रिय सदस्य है और उसके निर्णयकारी निकाय में उसका प्रतिनिधित्व भी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वित्तीय स्थिरता, पारदर्शिता और बेहतर नियमन की पैरवी करना अच्छी बात है, लेकिन इन सिद्धांतों को अपनी व्यवस्था में उतारना उससे भी ज्यादा जरूरी है। वैश्विक मानकों पर दूसरों को सलाह देने वाला देश यदि अपनी आपातकालीन तैयारी में कमी छोड़ता है, तो यह नीति और क्रियान्वयन के बीच का अंतर उजागर करता है। आपातकालीन सार्वजनिक फंडिंग और बैंक समाधान की तैयारियों से संबंधित है, इससे अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि भारतीय बैंक इस समय संकट में हैं। भारत को अब इस कमी को दूर करने के लिए समयबद्ध और ठोस कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि असाधारण संकट में तरलता उपलब्ध कराने का कानूनी और संस्थागत ढांचा क्या होगा। दूसरे, सहायता के लिए पात्रता, अवधि, शर्तों और जवाबदेही के नियम पहले से निर्धारित होने चाहिए। तीसरे, बैंक के विफल होने की स्थिति में उसके जरूरी कार्यों को जारी रखने, संपत्तियों और देनदारियों के समाधान, खरीदार तलाशने तथा जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा की स्पष्ट योजना होनी चाहिए। चौथे, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आपातकालीन सहायता बैंक के मालिकों और प्रबंधन को जवाबदेही से बचाने का रास्ता न बने। इन व्यवस्थाओं की नियमित जांच और संकट-सिमुलेशन भी जरूरी हैं, ताकि असली संकट आने पर सरकारी विभाग और नियामक पहली बार एक-दूसरे से समन्वय करना शुरू न करें।
भारत की बैंकिंग व्यवस्था पर उठते सवाल…!-संजय सक्सेना
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