अमेरिकी संगठन यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी के लिए बने इस संगठन ने अपनी रिपोर्ट में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन से कहा है कि भारत के इन दोनों संगठनों पर प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए। उसने अपनी रिपोर्ट में आरएसएस और रॉ के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए हैं। हालांकि यह किसी आधिकारिक सरकारी निर्णय नहीं है। जब तक अमरीकी प्रशासन स्वयं इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाता, तब तक इसका प्रभाव न के बराबर है। फिर भी इस मांग को केवल एक साधारण बयान मान लेना राजनीतिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।कूटनीतिक और घरेलू राजनीति में इसका प्रभाव लाजिमी है। दरअसल, पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका के कुछ थिंक-टैंक और मानवाधिकार समूह, भारत की मौजूदा राजनीतिक दिशा और वैचारिक ढांचे को लेकर समय-समय पर सवाल उठाते रहे हैं। आरएसएस, जिसे भारत की सत्तारूढ़ भाजपा की राजनीति की वैचारिक पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जाता है, उस पर इस तरह की मांग सीधे-सीधे देश की मौजूदा राजनीतिक धारा पर टिप्पणी के रूप में देखी जा सकती है। यानी यह केवल संगठन नहीं, बल्कि उससे जुड़े विचार को चुनौती देने की कोशिश भी है। दूसरी ओर, रॉ जैसी खुफिया एजेंसी पर प्रतिबंध की मांग एक अलग ही स्तर का संकेत देती है। किसी संप्रभु देश की आधिकारिक एजेंसी पर इस तरह का आरोप या प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बेहद असामान्य माना जाता है। यह या तो सूचनात्मक संदेहों का परिणाम हो सकता है या फिर रणनीतिक दबाव की राजनीति का हिस्सा। खासकर तब, जब भारत वैश्विक मंच पर खुद को उभरती शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, जब तक अमरीकी प्रशासन इस दिशा में कोई आधिकारिक कदम नहीं उठाता, तब तक इसे औपचारिक नीति नहीं माना जा सकता। कूटनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत और अमेरिका के संबंध आज केवल बयानबाजी से प्रभावित होने वाले नहीं हैं। रक्षा, व्यापार और इंडो-पैसिफिक रणनीति में दोनों देशों की साझेदारी इतनी गहरी हो चुकी है कि इस तरह की मांगें तत्काल कोई बड़ा असर नहीं डालती। फिर भी, यह घटनाक्रम एक संकेत जरूर देता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को अपनी नीतियों और संस्थाओं को लेकर अधिक स्पष्टता और संवाद की जरूरत है। इन सबके बीच घरेलू राजनीति में इसका असर अधिक स्पष्ट दिखता है। विपक्ष इस मुद्दे को सरकार और उससे जुड़े वैचारिक संगठनों की अंतरराष्ट्रीय छवि पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है। वहीं सत्तापक्ष इसे “विदेशी हस्तक्षेप” और “भारत विरोधी नैरेटिव” के रूप में पेश कर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगा। इस तरह यह मुद्दा आंतरिक राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज कर सकता है। हमारा मानना है कि इस घटनाक्रम के बाद भारत को वैश्विक मंच पर अपनी संस्थाओं, नीतियों और लोकतांत्रिक मूल्यों को और अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की जरूरत है। वहीं, घरेलू स्तर पर इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर तथ्यों और तर्कों के आधार पर देखने की जरूरत है। कोई बाहर के संगठन देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करें इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
आपकी बात: आरएसएस और रॉ पर प्रतिबंध की मांग रणनीतिक दबाव तो नहीं? – संजीव वर्मा
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