छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के बीच पिछले 43 साल चल रहे महानदी जल विवाद का समाधान अब संभव दिख रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव से साय की बीते रविवार को ओडिशा प्रवास के दौरान वहां के मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी के साथ बैठक में इसके संकेत मिले हैं। बैठक में दोनों मुख्यमंत्रियों के बीच महानदी जल विवाद के निपटारे को लेकर विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा हुई। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि अब इस मुद्दे को लेकर कोई विवाद नहीं है। दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है। ऐसे में इस विवाद का समाधान शीघ्र संभव है, क्योंकि केंद्र सरकार भी इस दिशा में सक्रिय है। निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। देर से ही सही लेकिन दोनों ओर से सकारात्मक समाधान की दिशा में उठाए जा रहे कदम सराहनीय है। इससे दोनों राज्यों को लाभ मिलेगा और क्षेत्र की प्रगति को गति मिलेगी। गौरतलब है कि महानदी जल बंटवारे का विवाद 1983 से चल रहा है। 2016 में विवाद उस समय खुलकर सामने आया जब ओडिशा ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ महानदी की ऊपरी धारा में कई बैराज और जल परियोजनाएं बना रहा है, जिससे विशेष कर गैर मानसून अवधि में हीराकुंड बांध तक पहुंचने वाले पानी में कमी हो सकती है। वहीं, छत्तीसगढ़ का कहना है कि महानदी के जल ग्रहण क्षेत्र का बड़ा हिस्सा उसके राज्य में है और उसे अपने हिस्से के पानी का उपयोग करने का अधिकार है। इस बीच 2017 में ओडिशा सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। 2018 में महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण बना। अब तक न्यायाधिकरण में 49 बार सुनवाई हो चुकी है। इस साल 30 जुलाई को दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच बैठक होने के बाद इस मुद्दे को सुलझाने की दिशा में तेजी आई। इस दौरान न्यायाधिकरण की अवधि 2026 तक बढ़ाई गई। सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत न्यायाधीश बेला एम. त्रिवेदी की अध्यक्षता में गठित न्यायाधिकरण ने दोनों राज्यों को 28 सितंबर 2026 तक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। वैसे महानदी विवाद का स्थायी समाधान केवल अदालत या न्यायाधिकरण के फैसले से नहीं, बल्कि दोनों राज्यों के बीच सहयोग से अधिक प्रभावी ढंग से निकल सकता है। सबसे पहले दोनों राज्यों को नदी के जलप्रवाह, वर्षा, बांधों के जलस्तर, सिंचाई और औद्योगिक उपयोग से संबंधित आंकड़ों को साझा करने की पारदर्शी व्यवस्था बनानी चाहिए। इससे पानी की उपलब्धता को लेकर अलग-अलग दावों और आशंकाओं को कम किया जा सकता है। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा मानसून के दौरान मिलने वाले अतिरिक्त पानी और गर्मी के दिनों में नदी के न्यूनतम प्रवाह का है। गैर-मानसूनी मौसम में ओडिशा की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम जलप्रवाह सुनिश्चित करने की वैज्ञानिक व्यवस्था बनाई जा सकती है। साथ ही छत्तीसगढ़ की वैध सिंचाई और पेयजल आवश्यकताओं का भी ध्यान रखना होगा। चूंकि महानदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों के लिए जीवनरेखा है। यह केवल आर्थिक संसाधन नहीं है। इसके साथ लाखों लोगों की आजीविका और नदी की पारिस्थितिकी जुड़ी हुई है। इसलिए पर्यावरणीय प्रवाह, मछलियों और जलीय जीवन, डेल्टा क्षेत्र तथा कृषि पर पड़ने वाले प्रभावों को भी जल प्रबंधन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बहरहाल, वर्तमान समय में दोनों राज्यों के बीच बातचीत और तकनीकी स्तर पर समन्वय की कोशिशें समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर क्षेत्र के विकास और किसानों के हितों को केंद्र में रखकर बातचीत आगे बढ़ती है तो लंबे समय से चले आ रहे विवाद का व्यावहारिक समाधान निकल सकता है। महानदी विवाद वास्तव में एक परीक्षा है कि क्या दो पड़ोसी राज्य पानी जैसे संवेदनशील संसाधन को राजनीतिक विवाद के बजाय सहयोग और सहकारी संघवाद के माध्यम से सुलझा सकते हैं। यदि इसका समाधान संवाद से निकलता है, तो यह केवल महानदी के लिए नहीं, बल्कि देश के अन्य अंतरराज्यीय नदी विवादों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है।
अब सुलझेगा महानदी जल विवाद..?- संजीव वर्मा
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