रायपुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) ही अब भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोपों में घिरते नजर आ रहे हैं। पिछले तीन वर्षों में प्रदेश के करीब , 40 जिला शिक्षा अधिकारियों पर घूसखोरी, खरीदी में गड़बड़ी, नियम विरुद्ध पदस्थापना और भर्ती में अनियमितता के आरोप लगे हैं। हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में दोष सामने आने के बावजूद कार्रवाई अब तक लंबित है।
शिक्षा विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक 2022 से 2025 के बीच अलग-अलग जिलों में पदस्थ डीईओ के खिलाफ गंभीर शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें करोड़ों रुपये की खरीदी, अनुकंपा नियुक्ति में गड़बड़ी, शिक्षकों के नियम विरुद्ध तबादले और सरकारी सामग्री की हेराफेरी जैसे मामले शामिल हैं।
तीन साल में सामने आए दर्जनों मामले साल 2022-23 में जशपुर, गरियाबंद, बेमेतरा, कोंडागांव, मुंगेली, सूरजपुर, बलौदाबाजार और जांजगीर-चांपा समेत कई जिलों के डीईओ पर अनियमितताओं के आरोप लगे। इनमें गरियाबंद के डीईओ भोपाल तांडेय पर सवा तीन करोड़ रुपये की खरीदी में अनियमितता का मामला सामने आया, जिसमें दोष सिद्ध होने के बाद भी कार्रवाई अभी प्रक्रियाधीन है।
इसी तरह जांजगीर-चांपा के डीईओ केएस तोमर पर अनुकंपा नियुक्ति में रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें निलंबित किया गया, लेकिन अंतिम कार्रवाई अब तक लंबित है। साल 2023-24 में भी कोंडागांव, राजनांदगांव, सूरजपुर, बलौदाबाजार, कांकेर और बिलासपुर समेत कई जिलों के अधिकारियों पर पदस्थापना, पदोन्नति और खरीदी से जुड़े मामलों में शिकायतें सामने आईं।
सूरजपुर के डीईओ रामललित पटेल पर 3 करोड़ 40 लाख रुपये की खाद्य सामग्री खरीदी में अनियमितता का आरोप लगा, जबकि बलौदाबाजार में आत्मानंद स्कूलों की भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी की शिकायतें दर्ज हुईं। साल 2024-25 में भी स्थिति नहीं बदली। रायपुर, जगदलपुर, सारंगढ़, धमतरी, सरगुजा और रायगढ़ समेत कई जिलों के डीईओ के खिलाफ जांच चल रही है।
रायपुर में स्कूलों की मान्यता से जुड़े घोटाले, राजनांदगांव और जशपुर में लाखों किताबों को कबाड़ के भाव बेचने, और सूरजपुर में रिश्वत लेने के मामले में एसीबी की गिरफ्तारी जैसे मामले सामने आए हैं। किताबें कबाड़ में बेचने तक के आरोप कई जिलों में तो स्थिति इतनी गंभीर रही कि सरकारी स्कूलों की लाखों किताबें कबाड़ के भाव में बेचने के आरोप सामने आए। राजनांदगांव, जशपुर और धमतरी जैसे जिलों में इस मामले की जांच चल रही है। इसके अलावा कुछ मामलों में जरूरत से ज्यादा यूनिफॉर्म की खरीदी दिखाने और फर्जी जानकारी देने जैसी शिकायतें भी सामने आई हैं।
शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल जिला शिक्षा अधिकारी किसी भी जिले की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। स्कूलों की निगरानी, शिक्षकों की पोस्टिंग, शैक्षणिक सामग्री की खरीदी और विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी उन्हीं के पास होती है। ऐसे में जब उन्हीं अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप लगें, तो पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।
इन मामलों में कई जगह जांच पूरी होने के बाद भी अंतिम कार्रवाई नहीं हो पाई है। अधिकतर मामलों में “कार्रवाई प्रक्रियाधीन” बताकर फाइलें लंबित रखी गई हैं। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार के मामलों पर सख्त कार्रवाई करने में प्रशासनिक स्तर पर ढिलाई बरती जा रही है।
विपक्ष का आरोप है कि शिक्षा विभाग में अनियमितताओं के मामलों में सरकार की कार्रवाई धीमी है। कांग्रेस विधायकों का कहना है कि अगर समय पर कड़ी कार्रवाई की जाती, तो इतने बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों के मामले सामने नहीं आते।
वहीं सरकार का कहना है कि जिन अधिकारियों पर आरोप लगे हैं, उनके मामलों की जांच की जा रही है और दोष सिद्ध होने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।
