जर्जर इमारतें, बढ़ती भीड़ और लापरवाह सिस्टम…-संजय सक्सेना

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दिल्ली में पढ़ाई और बेहतर करियर का सपना लेकर आने वाले छात्रों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कॉलेज या कोचिंग की फीस नहीं है। असली संकट सुरक्षित रहने की जगह का भी है। हॉस्टलों में सीमित सीटें और लगातार बढ़ती छात्र आबादी ने सत्य निकेतन, मोती बाग, मुखर्जी नगर, करोल बाग जैसे इलाकों में पीजी कारोबार को तेजी से बढ़ाया है। लेकिन इस बढ़ते कारोबार के बीच एक सवाल लगातार पीछे छूटता गया—जिस इमारत में छात्र रह रहे हैं, वह कितनी सुरक्षित है? सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत के ढहने की घटना ने इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है। हादसे के बाद पीजी में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा, भवनों की संरचनात्मक मजबूती, फायर सेफ्टी और प्रशासनिक निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं। कमरे नहीं, बेड बिक रहे हैं- दिल्ली के छात्र इलाकों में पीजी का कारोबार अब सिर्फ किराये पर कमरा उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। एक कमरे में कई बेड लगाए जाते हैं और प्रत्येक बेड के लिए अलग किराया लिया जाता है। सुविधाओं के नाम पर वाई-फाई, एसी, खाना, जिम और सिक्योरिटी जैसी चीजें गिनाई जाती हैं, लेकिन भवन की सुरक्षा का सवाल अक्सर सबसे पीछे चला जाता है। रिपोर्टों के अनुसार कई इलाकों में एक बेड का किराया 10 से 20 हजार रुपये या उससे भी ज्यादा पहुंच जाता है। यानी छात्र जिस जगह के लिए हर महीने बड़ी रकम चुका रहा है, वहां उसकी पहली जरूरत—सुरक्षित छत—की गारंटी कौन दे रहा है? भीड़ बढ़ी, लेकिन निगरानी उसी अनुपात में नहीं- सत्य निकेतन जैसे इलाकों में बड़ी संख्या में पीजी, किराये के कमरे और हॉस्टल संचालित होते हैं। संकरी गलियां, बहुमंजिला इमारतें और बड़ी संख्या में रहने वाले छात्र किसी आपात स्थिति में जोखिम को कई गुना बढ़ा देते हैं। ऐसे में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कोई पीजी चल रहा है या नहीं। सवाल यह होना चाहिए कि—इमारत की संरचनात्मक जांच कब हुई? उसमें रहने की स्वीकृत क्षमता कितनी है? क्या उससे ज्यादा लोगों को रखा जा रहा है?फायर सेफ्टी मानकों का पालन हो रहा है या नहीं? आपातकालीन निकास उपलब्ध है या नहीं बिजली की वायरिंग सुरक्षित है या नहीं? बेसमेंट या अन्य हिस्सों में अनधिकृत निर्माण तो नहीं हुआ? इन सवालों की नियमित जांच नहीं होगी तो हादसे के बाद कार्रवाई करना सिर्फ नुकसान की भरपाई भर रह जाएगा। पीजी और भवन सुरक्षा से जुड़े नियम अलग-अलग व्यवस्थाओं में बंटे हुए हैं। भवन निर्माण और स्वीकृति के नियम अलग हैं, जबकि अग्नि सुरक्षा की निगरानी अलग व्यवस्था के तहत होती है। यही बिखरा हुआ ढांचा आम नागरिक के लिए यह समझना मुश्किल बना देता है कि किसी पीजी की पूरी सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। सत्य निकेतन हादसे ने इसी प्रशासनिक गैप को उजागर किया है। यदि किसी इलाके में सैकड़ों छात्र वर्षों से किराये पर रह रहे हैं, तो उनकी सुरक्षा की नियमित ऑडिट व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए? किसी इमारत के गिरने के बाद एफआईआर, जांच कमेटी और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की घोषणा जरूरी है। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है यह पता लगाना कि जिस खतरे को हादसे के बाद पहचाना गया, उसे पहले क्यों नहीं पहचाना गया? अगर भवन पहले से कमजोर था, अगर निर्माण नियमों का उल्लंघन था या अगर क्षमता से ज्यादा लोग वहां रह रहे थे, तो निगरानी एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही वजह है कि सत्य निकेतन की घटना को सिर्फ एक स्थानीय हादसा मानकर खत्म नहीं किया जा सकता। यह दिल्ली के उन तमाम छात्र इलाकों के लिए चेतावनी है जहां हर साल हजारों नए छात्र पहुंचते हैं और मजबूरी में पीजी को अपना घर बना लेते हैं।
दिल्ली ही नहीं देश के तमाम बड़े शहरों महानगरों में बच्चे पीजी हॉस्टलों पर निर्भर हैँ। इस मजबूरी को अगर सिर्फ कमाई के मॉडल में बदल दिया गया और सुरक्षा को बाजार की शर्तों पर छोड़ दिया गया, तो ऐसे हादसों का खतरा बना रहेगा।कई जगह घटनाएं हो रही हैँ. लेकिन क़ोई ठोस कदम उठते नहीं दिख रहे हैँ। सरकार और स्थानीय निकायों को अब पीजी सेफ्टी ऑडिट की नियमित व्यवस्था पर गंभीरता से काम करना चाहिए। भवन की संरचनात्मक मजबूती, फायर सेफ्टी, बिजली व्यवस्था, आपातकालीन निकास और अधिकतम रहने की क्षमता—इन सभी की संयुक्त जांच होनी चाहिए। सिर्फ हादसे के बाद दोषी तलाशने से व्यवस्था सुरक्षित नहीं होगी। जरूरत उस सिस्टम की है जो हादसा होने से पहले खतरे को पहचान सके। सत्य निकेतन का मलबा सिर्फ एक इमारत का मलबा नहीं है। उसके नीचे दबे सवाल दिल्ली के पूरे पीजी सिस्टम से पूछे जा रहे हैं—क्या छात्रों को सुरक्षित रहने का अधिकार सिर्फ कागजों पर है? और क्या अगला हादसा होने से पहले सिस्टम सचमुच जागेगा?