किस्तान में 125 साल पुराना मंदिर ढहा, तहरीक-ए-लब्बैक पर उठे सवाल

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इस्लाहाबाद। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के हालात कैसे हैं, यह पूरी दुनिया में किसी से नहीं छिपा है। हालांकि, अब शहबाज शरीफ की सरकार के कार्यकाल में चरमपंथी ताकतें प्रतिबंधित होने के बावजूद खुलेआम न सिर्फ लोगों को डरा रही हैं, बल्कि उनके पूजास्थलों को भी ढहाने और उसकी जमीन पर कब्जा करने में जुट गई हैं। ताजा मामला पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले का है। यहां सिराज गांव में एक चरमपंथी संगठन- तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) ने कथित तौर पर एक 100-125 साल पुराने हिंदू पूजास्थल को ढहा दिया। कहा जा रहा है कि इस संगठन ने ऐसा मंदिर की जमीन पर कब्जा करने और पास ही मौजूद एक मदरसे का दायरा बढ़ाने के लिए किया।

आइये जानते हैं कि, जिस मंदिर के ढहाए जाने को लेकर इस वक्त पाकिस्तान में बवाल मचा है, वह क्या है और कहां है? इसके साथ हाल ही में ऐसा क्या हुआ, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान चरमपंथी संगठन और उनकी खुलेआम अल्पसंख्यकों के खिलाफ किए जा रहे जुर्मों की तरफ कर दिया है? यह तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान क्या है, जिससे न सिर्फ अल्पसंख्यक, बल्कि पाकिस्तान की सरकार तक घबराती है? क्यों शहबाज सरकार की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद यह संगठन मजबूत बना हुआ है? इसके अलावा पाकिस्तान में मंदिरों को गिराए जाने की घटनाएं कब और क्यों हुई हैं? आइये जानते हैं…

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कब ढहाया गया यह पूजा स्थल, क्यों पैदा हुआ विवाद?
इस ऐतिहासिक हिंदू मंदिर को 21 अगस्त 2026 को ढहाया गया था। हालांकि, इसे ढहाए जाने के मामले ने तूल अगस्त के अंत में पकड़ा। दरअसल, इस मंदिर के ढहने की वजहों और इसकी भूमि पर अवैध कब्जे को लेकर दो परस्पर विरोधी दावे सामने आ गए, जिससे यह विवाद और बड़ा हो गया है।

अल्पसंख्यक संगठन बोले- मंदिर को सोची-समझी साजिश के तहत गिराया गया
* स्थानीय हिंदू प्रतिनिधियों और अल्पसंख्यक संगठनों का आरोप है कि लगभग 100 से 125 साल पुराने इस मंदिर को जानबूझकर और एक साजिश के तहत गिराया गया है, ताकि मंदिर की करीब 1,000 वर्ग मीटर जमीन पर पास के मदरसे का कब्जा कराया जा सके।

* पाकिस्तान मसीहा मिल्लत पार्टी के अध्यक्ष असलम परवेज सहोत्रा ने बताया कि मंदिर विध्वंस में चरमपंथी धार्मिक राजनीतिक दल तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) से जुड़े लोग शामिल थे। वे मंदिर को गिराने के बाद उसके शिखर से धातु के उपकरण और ईंटें भी उठाकर ले गए।

* सहोत्रा के मुताबिक, मंदिर से सटी जमीन को पहले इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) ने मदरसे के लिए पट्टे पर दिया था। किराया न चुकाने और नियमों के उल्लंघन के कारण 29 जनवरी 2026 को इस पट्टे को रद्द कर दिया गया और अवैध कब्जा हटाने के आदेश दिए गए थे, लेकिन प्रशासन ने इस आदेश को लागू नहीं किया।

नारोवाल जिला शांति समिति और ‘पाक धरम आस्थान हिंदू समिति’ के सदस्य और हिंदू समुदाय के नेता रतन लाल ने घटना स्थल के आसपास के डरावने माहौल को बयां करते हुए कहा- “मंदिर परिसर में जो मदरसा लगातार चल रहा है, उसकी उपस्थिति के कारण हम अब उस जगह पर जाने से भी डरते हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि जिला प्रशासन सुरक्षा चेतावनियों के बावजूद मंदिर की रक्षा करने और वहां से अवैध कब्जे हटाने में पूरी तरह विफल रहे।

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प्रशासन बोला- भारी बारिश की वजह से गिर गया मंदिर का ढांचा
अल्पसंख्यक संगठनों के उलट ईटीपीबी के वरिष्ठ अधिकारी राणा इफ्तिखार और जिला प्रशासन ने जानबूझकर ढांचा गिराए जाने के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। उनका कहना है कि हाल ही में हुई मूसलाधार बारिश के कारण यह पुराना और जर्जर ढांचा अपने आप ढह गया। अधिकारी ने सफाई दी कि मंदिर की मूल भूमि को कभी किसी को पट्टे पर नहीं दिया गया।

क्या है चरमपंथी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक, जिस पर मंदिर ढहाने के आरोप?
तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) पाकिस्तान का प्रतिबंधित चरमपंथी, कट्टरपंथी और अति-दक्षिणपंथी इस्लामी राजनीतिक संगठन है। इसी संगठन पर नारोवाल जिले में एक 100 साल से भी पुराने ऐतिहासिक हिंदू मंदिर को ढहाने का आरोप लगा है।
* इसके संस्थापक खादिम हुसैन रिजवी की नवंबर 2020 में 54 वर्ष की आयु में प्राकृतिक कारणों से मृत्यु हो गई थी।
* फिलहाल इस संगठन का नेतृत्व खादिम का बेटा साद हुसैन रिजवी और उसका छोटा भाई अनस हुसैन रिजवी कर रहा है।

इस संगठन ने जो बरेलवी विचारधारा अपनाई है, उसकी जड़ें भारत के उत्तर प्रदेश में स्थित बरेली शहर से जुड़ी हैं। टीएलपी मुख्य रूप से पाकिस्तान के सख्त ईशनिंदा कानूनों पर अपने जबरदस्त हिंसक और कट्टर रुख के लिए जाना जाता है। यह ईशनिंदा के आरोपियों को तुरंत मौत की सजा देने की वकालत करता है और अक्सर भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा, पीट-पीट कर हत्या और हिंसक न्याय का समर्थन करता है। टीएलपी मुख्य रूप से ईशनिंदा जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दों पर जनभावनाओं को भड़काकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकती है। वह ईशनिंदा के आरोपियों को तुरंत मौत की सजा देने की मांग जैसे कड़े और हिंसक रुख अपनाकर एक बड़े पारंपरिक वर्ग को अपने पक्ष में वोट देने के लिए राजी कर लेती है।

इसकी हिंसक गतिविधियों के कारण अमेरिका ने इसे 2019 में एक आतंकवादी संगठन के रूप में नामित किया था, हालांकि 2021 में इसे इस सूची से हटा दिया गया। पाकिस्तानी सरकार ने भी इस पर पहले दो बार प्रतिबंध लगाया है, लेकिन इसके वफादार समर्थक आधार के कारण सरकार इस पर पूरी तरह लगाम लगाने में हमेशा संघर्ष करती रही है।

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किस मामले से दुनिया की नजर में आया तहरीक-ए-लब्बैक?
यह संगठन पहली बार पाकिस्तान के बहुचर्चित आसिया बीबी ईशनिंदा केस से चर्चाओं में आया था। दरअसल, इस संगठन ने मुमताज कादरी का पुरजोर समर्थन किया और सुर्खियां बटोरीं। मुमताज कादरी वह पुलिस कांस्टेबल था, जिसने 2011 में पंजाब के तत्कालीन गवर्नर सलमान तासीर की गोली मारकर हत्या कर दी थी, क्योंकि गवर्नर ने ईशनिंदा की आरोपी एक ईसाई महिला- आसिया बीबी के प्रति सहानुभूति दिखाई थी।

और किन-किन कट्टरपंथी गतिविधियों के लिए चर्चित?
1.ईसाई-अहमदिया सबसे ज्यादा निशाने पर: इस संगठन पर पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर विशेष रूप से ईसाइयों और अहमदिया समुदाय को लगातार निशाना बनाने, उनके पूजा स्थलों पर हमले करने और उनकी कब्रों को अपवित्र करने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं।

2.शहरों को ठप करने की ताकत: टीएलपी अपने हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के जरिए पूरे देश को ठप करने की ताकत रखता है। साल 2017 में इसके पहले बड़े आंदोलन ने हफ्तों तक राजधानी इस्लामाबाद को पूरी तरह ठप कर दिया था। इसके बाद 2020, 2021 में फ्रांस और डेनमार्क के खिलाफ हुए हिंसक प्रदर्शनों में 20 से ज्यादा लोगों, जिनमें अधिकतर पुलिसकर्मी थे, की मौत हुई थी।

3.गाजा शांति समझौता विवाद: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से घोषित गाजा शांति समझौते, जिसे पाकिस्तान सरकार ने भी स्वीकार किया था, के विरोध में तहरीक-ए-लब्बैक ने अल-अक्सा गाजा मार्च का आह्वान किया था। इस हिंसक प्रदर्शन के बाद पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज शरीफ के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार ने इस चरमपंथी दल को आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंधित करने की मांग की और इसके हजारों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया।

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पाकिस्तान में टीएलपी की सियासी पैठ कितनी, क्यों घबराती है सरकार?
तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान में सिर्फ एक चरमपंथी या उग्रवादी संगठन से ऊपर राजनीतिक पैठ वाला संगठन है। सरकारी प्रतिबंधों और सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों के बावजूद इसका एक ऐसा धार्मिक कट्टर वफादार समर्थक आधार बना हुआ है, जिसे नजरअंदाज करना अब तक पाकिस्तान की सरकारों के लिए भी मुश्किल हुआ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस संगठन के प्रदर्शनों से इस्लामाबाद में बैठा हुक्मरान भी खौफ खाता है।

लाखों वोटरों का आधार: टीएलपी ने पाकिस्तान के 2018 और 2024 दोनों आम चुनावों में भाग लिया था। भले ही यह पार्टी कभी भी नेशनल असेंबली (संसद) में एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही, लेकिन दोनों ही बार इसने देश भर में 20 लाख से ज्यादा वोट हासिल किए।

2018 के चुनाव: अपने पहले बड़े चुनाव में ही टीएलपी कुल प्राप्त वोटों के मामले में पूरे पाकिस्तान की पांचवीं सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनकर उभरी थी। इसके साथ ही, इसने सिंध प्रांत की विधानसभा में तीन प्रांतीय सीटें जीतने में सफलता हासिल की थी। 2018 में यह सबसे अधिक वोट पाने वाली देश की पांचवीं बड़ी पार्टी बनी थी।

2024 के चुनाव: इन चुनावों में पार्टी का जनाधार और बढ़ा और यह कुल वोटों के मामले में देश की चौथी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गई। इस चुनाव में इसने पंजाब प्रांत की प्रांतीय विधानसभा में एक सीट पर जीत दर्ज की।

 

मंदिरों को निशाना बनाए जाने के पीछे कई गहरी वजहें भी
1. भूमि कब्जाने और आर्थिक स्वार्थ की नीतियां
पाकिस्तानी समाचार पत्र ‘डॉन’ के मुताबिक, अक्सर पैसों या जमीन के आपसी विवादों को दबाने, अल्पसंख्यकों को वहां से खदेड़ने या जमीन कब्जाने के लिए जानबूझकर धार्मिक विवादों को हवा दी जाती है और मंदिरों को निशाना बनाया जाता है।

2. ऐतिहासिक और राजनीतिक तनाव
हिंदू अल्पसंख्यकों की असुरक्षा के पीछे भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराना तनाव, 1980 के दशक की पाकिस्तान की इस्लामीकरण नीतियां और भारत में 1992 का बाबरी मस्जिद विवाद जैसे ऐतिहासिक कारण भी जुड़े हैं।

3. कट्टरपंथ और भेदभाव वाली शिक्षा
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, समाज में बढ़ती धार्मिक कट्टरता, कट्टरपंथी धार्मिक समूहों का प्रभाव और स्कूली पाठ्यक्रम (जो गैर-मुस्लिमों के प्रति संवेदनहीनता को बढ़ावा देता है) भी ऐसी भीड़ जनित हिंसा के लिए जिम्मेदार हैं।

4. प्रशासनिक विफलता और कानून का डर न होना
स्थानीय पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां अक्सर धार्मिक नेताओं या कट्टरपंथी भीड़ के सामने कार्रवाई करने से कतराती हैं, जिसके कारण अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल पाती।

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