पूरे विश्व में आदिवासियों की एक बहुत बड़ी आबादी निवास करती है।अनेक विचारक इन्हें मूल निवासी भी कहते हैं।इनकी प्राचीन कला संस्कृति और मूल अधिकार के संरक्षण की आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए पहली बार 09 अगस्त 1982 को संयुक्त राष्ट्र संघ (यू.एन.ओ) की बैठक हुई।इसमें आदिवासियों के हित और विकास को लेकर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। आगे वर्ष 1993 में जिनेवा (स्विटजरलैंड )में आयोजित अंतरराष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन में प्रति वर्ष 09 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाए जाने का निर्णय लिया गया।विश्व आदिवासी दिवस मनाने का ऐतिहासिक फैसला नई पीढ़ी को आदिवासियों की जीवंत को अवगत कराने में में कारगर हुआ। पहाड़- घाटियों के बीच हिंसक पशुओं से जूझते हुए आदिवासी समुदाय की खुशियों भरी जिंदगी से दुनिया वाकिफ हुई। प्रकृति के निकटस्थ रहने वाले आदिवासी समुदाय पर्यावरण संरक्षण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी जीवन शैली शहरी सभ्यता में जीते नागरिकों को सीख देती है कि जल जंगल जमीन का संतुलित उपभोग ही जीव जगत को संपूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करती है। शासकीय योजनाओं पर आश्रित रहने के बजाय पर्यावरण संरक्षण हेतु वे अनादिकाल से असल पर्यावरण संरक्षण के मूल योद्धा के रूप में जीवन को समर्पित करके रखे हुए हैं।उनकी जीवन शैली, रीति-रिवाजों,पर्व परम्पराओं में प्रकृति के प्रति प्रेम बनावटी दिखावटी नहीं है, बल्कि सौ फीसदी खांटी है। अनादिकाल से आदिवासी समुदाय सिखाते आ रहा है भूख मिटाने के लिए बाज़ार की आवश्यकता उन्हें नहीं है बल्कि शहरी जन-जीवन की भूख उनके जंगल जलवायु की शत्रु बन बैठी है।
आदिवासियों को गिरीजन कहते थे गांधी
आदिवासियों को महात्मा गांधी ‘गिरीजन अर्थात पहाड़ों पर रहने वालेÓ कहते थे। उनका मानना था कि इन्हें भूलाना माने अपने मूल संस्कृति से भागने की भूल जैसे कृत्य है।मूल संस्कार से बढ़ती दूरी के कारण ही घर परिवार समाज में घातक हिंसा दिनों दिन बढ़ रही है। समाजशास्त्रियों ने भी समाज में बढ़ती हिंसा का बड़ा कारण विकृत होती संस्कृति को बताया है।
आदिवासी बाहुल्य राज्य छत्तीसगढ़
भारत का ह्दय स्थल छत्तीसगढ़ भी आदिवासी बाहुल्य राज्य है।यहां की लगभग इकत्तीस प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजातियों की है।नवम्बर 2000 में जब छत्तीसगढ़ को स्वतंत्र राज्य का दर्जा मिला तो यहां के आदिवासियों के मन में भी एक नई सुबह की,नई उम्मीद की किरण जगी।सदियों से शोषित उपेक्षित आदिवासी लोककला-संस्कृति के पुनर्जीवित एवं प्रतिष्ठित होने का सुनहरा अवसर दिखा। बीते छब्बीस वर्षों में आदिवासियों की अनेक आस पूरी हुई है।घोर नक्सल प्रभावित आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र बस्तर नक्सली मुक्त खुशहाल बस्तर बन गया है। यद्यपि आज भी विविध किस्म के शोषकों से घिरे आदिवासियों समाज के अनेक सपने अधूरे हैं।उनकी चाहत पत्थर की मूरत बनी अहिल्या की भांति किसी राम के आने और उसके स्पर्श से सजीव होने की चाह में घुट रही है।शासन और समाजसेवियों द्वारा इन्हें चिन्हित करके और अधिक तत्परता से कार्य करने की आवश्यकता है। विश्व आदिवासी दिवस 09 अगस्त पर छत्तीसगढ़ में सामान्य अवकाश देने की शुरुआत की गई है। प्रदेश इतिहास में पहली बार हुई इस पहल से आदिवासी कला,संस्कृति को प्रतिष्ठित कराने तथा आदिवासी समाज के लोगों के उत्थान की नई आस जगी है।
छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की जीवटता हुई उजागर
नवा रायपुर में बृहद आदिवासी संग्रहालय का नवनिर्माण हुआ है। आदिवासी दिवस पर भव्य समारोह के आयोजन की शुरुआत हुई है। ऐसी पहल से बड़े पैमाने पर जन जन के बीच यह बात भी उजागर हुई कि देश को आजाद कराने में छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदाय का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बताता है कि अबुझमाड़ के वीर गेंदा सिंह ने वनवासियों के साथ अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ी थी। इसी तरह सोना खान के सपूत वीर नारायण सिंह,फिरंगियों से लोहा लेने कूद पड़े थे।जिन्हें रायपुर के जयस्तंभ चौक में अंग्रेजों ने फांसी दे दी।स्वतंत्रता संग्राम के छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद होने का गौरव इन्हें प्राप्त है। इस समाज के वीर गुंडाधुर,गेंदसिंह, राजा भैरम देव तथा बस्तर के गांधी कहे जाने वाले इन्दरू केवट का नाम भी फिरंगियों की नाक में नकेल डालने के लिए जाना जाता है।आदिवासी समाज के वीर सपूतों का पराक्रम, संघर्ष,भोलापन और लोकनृत्यों के प्रति दीवानगी को देखते हुए कविश्री की पंक्तियों में कहना होगा ‘आदिवासी भाईयों के मिजाज लाजवाब है।गणित की किताब में वे रखते गुलाब है।
अतीत से उबरते उत्थान की ओर बढ़ते गिरीजन-विजय मिश्रा
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