बदलाव की नई उम्मीद-गिरीश पंकज

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भारत अपनी स्वाधीनता के आठ दशकों के ऐतिहासिक पड़ाव की ओर अग्रसर है। एक तरफ जहाँ हम वैश्विक पटल पर आर्थिक, वैज्ञानिक और तकनीकी महाशक्ति बनने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण भारत की ज़मीनी हक़ीक़त आज भी कई बुनियादी चुनौतियों से जूझ रही है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हमारी शिक्षा व्यवस्था और ग्रामीण बुनियादी ढाँचे की है, जहाँ आज भी अनेक सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में मूलभूत सुविधाओं, विशेषकर शौचालयों का गंभीर अभाव देखने को मिलता है। किसी भी समाज के विकास का सही मापदंड यह है कि वहाँ की बेटियां कितनी सुरक्षित और शिक्षित हैं। ग्रामीण भारत के स्कूलों में पृथक बालिका शौचालयों का न होना केवल एक ढांचागत कमी नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर बालिकाओं के मानवाधिकार, स्वास्थ्य और शिक्षा के अधिकार पर प्रहार करता है। जब बालिकाएं किशोरावस्था में कदम रखती हैं, तब स्कूलों में स्वच्छ और सुरक्षित पृथक शौचालय न होने के कारण उन्हें अत्यधिक मानसिक और शारीरिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। शर्म, असुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों के कारण लाखों लड़कियां बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं। यह स्थिति न केवल उनके भविष्य को अंधकारमय बनाती है, बल्कि देश के समग्र लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण के अभियानों को भी पीछे धकेलती है। हाल ही में छत्तीसगढ़ से एक बेहद राहत भरी और सकारात्मक खबर सामने आई है। राज्य के हज़ारों स्कूलों में बालिकाओं के लिए अलग से शौचालय न होने की पुरानी समस्या को स्वीकार करते हुए, सरकार ने एक ठोस और बड़े पैमाने पर योजना तैयार की है। वीबी-जी रामजी के तहत छत्तीसगढ़ के 6671 स्कूलों में बालिकाओं के लिए अलग से आधुनिक शौचायलयों का निर्माण किया जाएगा, यह निर्णय राज्य की शैक्षणिक और सामाजिक व्यवस्था में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। यदि इस योजना का क्रियान्वयन पूरी पारदर्शिता, गुणवत्ता और गति के साथ किया जाता है, तो इसके दूरगामी और बेहद सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे, जैसे सुरक्षित शौचालय की सुविधा मिलने से ग्रामीण बालिकाओं की स्कूल छोडऩे की दर में भारी गिरावट आएगी। लड़कियां बिना किसी संकोच और भय के नियमित रूप से स्कूल आ सकेंगी। स्वच्छता के अभाव में होने वाले संक्रामक रोगों और स्वास्थ्य समस्याओं से बालिकाओं को सुरक्षा मिलेगी। विकसित भारत रोजगार आजीविका गारंटी मिशन (वीबी-जी रामजी) के तहत केवल शौचालय निर्माण ही नहीं, बल्कि पूरे देश के गाँवों के समग्र उन्नयन और ढांचागत विकास की व्यापक योजनाएं बनाई जा रही हैं। यह पहल इस बात का प्रमाण है कि केंद्र और राज्य सरकारें ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने के प्रति गंभीर हैं। गाँवों के स्कूलों, सड़कों, पेयजल व्यवस्था और आजीविका के साधनों का सुधार ही वास्तविक अर्थों में विकसित भारत की नींव रख सकता है। जब गाँव सशक्त होंगे, तभी देश आत्मनिर्भर बनेगा। योजनाएं बनाना एक शुरुआत है, लेकिन असली चुनौती उन्हें ज़मीन पर उतारना होती है। अतीत में भी कई निर्माण कार्य केवल कागज़ों तक सीमित रह गए या फिर घटिया निर्माण सामग्री और रख-रखाव के अभाव में समय से पहले जर्जर हो गए। छत्तीसगढ़ के इन 6,671 स्कूलों में शौचालय निर्माण के मामले में भी यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि कार्य को एक तय समयसीमा के भीतर पूरा किया जाए। ध्यान यह भी रहे कि निर्माण की गुणवत्ता से कोई समझौता न हो। केवल शौचालय बना देना ही काफी नहीं होगा, उनके नियमित रखरखाव यानी नियमित साफ सफाई और पानी की निरंतर आपूर्ति की पुख्ता व्यवस्था की जाए। वरना शौचालयों की हालत कुछ दिन बाद घुसने लायक नहीं रह जाती. घुसते ही वहां की गंदगी और दुर्गंध से सांस लेना मुश्किल हो जाता है। आज़ादी का अमृत काल तभी सार्थक होगा जब देश के अंतिम छोर पर बैठी ग्रामीण बालिका को भी सम्मानपूर्वक और सुरक्षित वातावरण में शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलेगा। छत्तीसगढ़ सरकार और वीबी-जी रामजी मिशन का यह कदम एक अत्यंत सराहनीय प्रयास है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह कार्य बिना किसी प्रशासनिक देरी के जल्द से जल्द संपन्न होगा, ताकि ग्रामीण क्षेत्र की बेटियां बिना किसी बाधा के अपने सपनों की उड़ान भर सकें।