शिवसेना UBT सांसदों का शिंदे गुट में विलय, संजय राउत ने क्यों कहा- यह लोकतंत्र की हत्या-दुष्कर्म?

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मुंबई। शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना में विलय को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की मंजूरी मिलने के एक दिन बाद पार्टी नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने केंद्र सरकार और लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर तीखा हमला बोला। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए कहा कि यह ‘लोकतंत्र का दुष्कर्म और हत्या’ है। रविवार को मुंबई में पत्रकारों से बातचीत करते हुए राउत ने कहा कि जिन सांसदों को जनता ने शिवसेना (यूबीटी) के ‘मशाल’ चुनाव चिह्न पर वोट देकर जिताया था, उन्हें खरीद लिया गया। उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र के साथ गंभीर अपराध है।

संविधान में ऐसे विलय की अनुमति नहीं’
संजय राउत ने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल कानून) के अनुसार न तो दल में विभाजन की अनुमति है और न ही इस तरह का विलय संभव है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब संविधान में ऐसा प्रावधान नहीं है तो लोकसभा अध्यक्ष ने छह सांसदों के विलय को मंजूरी कैसे दे दी। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक मूल्यों की खुलेआम अनदेखी की जा रही है और इस फैसले पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने पर भी जताई नाराजगी
संजय राउत ने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाने के मामले में भी केंद्र सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में हर नागरिक को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है। संजय राउत ने कहा कि महात्मा गांधी ने भी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का रास्ता अपनाकर अंग्रेजों को बातचीत के लिए मजबूर किया था। लेकिन आज जब सोनम वांगचुक भूख हड़ताल कर रहे हैं, तब सरकार उनसे बातचीत करने के बजाय उन्हें जबरन अस्पताल ले जाती है।

उन्होंने आरोप लगाया कि सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटाने के दौरान उचित व्यवस्था तक नहीं की गई। यहां तक कि उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए स्ट्रेचर भी उपलब्ध नहीं कराया गया। संजय राउत ने कहा कि उन पर अनशन खत्म करने का दबाव बनाया गया, जिसकी निंदा होनी चाहिए।

क्या है पूरा मामला?
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शनिवार को शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय को मंजूरी दी थी। इसके बाद उद्धव ठाकरे गुट लगातार इस फैसले का विरोध कर रहा है और इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा दल-बदल विरोधी कानून की भावना के खिलाफ बता रहा है। वहीं, संजय राउत ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार और लोकसभा अध्यक्ष दोनों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।