राजधानी रायपुर के लोग सहज,सरल, विनम्र मितभाषी एवं सुसंस्कृत हैं। सभी धर्म और जाति के लोग यहाँ मिलजुल रहते हैं यही वजह है कि इसे लघु भारत भी कहा जाता है। अनेकता में एकता क अद्भुत दृश्य दिखाई देता है यहाँ। छत्तीसगढ़ी, आदिवासी एवं गैर-आदिवासी व्यंजन के अलावा यहाँ के लोग मुख्य रूप से गेहूं, ज्वार, चावल, मक्का एवं तिलहन से बने व्यंजन खूब पसंद करते हैं। स्वास्थ्य, सुरक्षा,पर्यावरण एवं आवागमन की दृष्टि से रहने के लिए यह शहर बहुत सुरक्षित माना जाता है। जहाँ तक सांस्कृतिक गतिविधियों का सवाल है तो छत्तीसगढ़ में सरकार के अधीन जो संस्कृति विभाग है वह विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, योजनाओं एवं प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोककला, संगीत, साहित्य, जनजातीय कला एवं पुरातात्विक धरोहरों को संरक्षित और संवर्धित करने का सुचारू रूप से कार्य करता है। रायपुर जिले के सांस्कृतिक परिदृश्य में पूरे छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं एवं संस्कृति की झलक दिखाई देती है। इसीलिए इसे प्रदेश का सांस्कृतिक केन्द्र माना जाता है। यहाँ कचहरी चौक के निकट स्थित महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय जिसकी स्थापना सन 1875 में हुई थी में प्राचीन शिलालेखों, सिक्कों और आदिवासी कलाकृतियों को खूबसूरती से सँजोया गया है एवं नया रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में शासन द्वारा छत्तीसगढ़ की आदिवासी जीवन शैली, कला और वास्तुकला को दर्शाने वाला एक विशाल खुला संग्रहालय बनाया गया है। समकालीन कला, चित्रों और स्थानीय डिजाइन को संग्रहित करने रायपुर के सिविल लाइन में महाकौशल आर्ट गैलरी का निर्माण किया गया है। हर तीज- त्योहार एवं उत्सव के दौरान राजधानी में लोककला, संगीत एवं नृत्य के अंतर्गत प्राय: महाभारत की कथाओं पर आधारित पंडवानी का संगीतमय गायन तथा पंथी, करमा एवं राउत नाचा का आयोजन किया जाता है। साथ ही हरेली, पोला, तीजा और गौरी- गौरा जैसे आंचलिक त्योहार पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं। खारून नदी के तट पर प्रतिवर्ष लगने वाला महादेव घाट मेला प्रसिद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक मेले के रूप में प्रदेशभर में जाना जाता है। इसके अलावा रायपुर शहर के विवेक नगर में कला, अभिव्यक्ति और सामाजिक संवाद हेतु स्थित कान्फ्लिक्टोरियम एवं विवेकानंद सरोवर जहाँ का वातावरण शाम के समय सांस्कृतिक कार्यक्रमों और संगीत से सराबोर रहता है लोगों के आकर्षण का केन्द्र माने जाते हैं। विगत दिनों छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय साहित्य महोत्सव में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, संगीत, कला, साहित्य एवं नृत्य का अद्भुत संयोजन दिखाई दिया जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।राजधानी रायपुर में क्रियाशील विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक संस्थाएँ विशेष रूप से संस्कार भारती भी विभिन्न आयोजनों के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, संगीत, कला, साहित्य, नृत्य, चित्रकला एवं विलुप्त होते वाद्य यंत्रों को संरक्षित एवं संवर्धित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। कुल मिलाकर राजधानी रायपुर का सांस्कृतिक परिदृश्य अत्यंत समृद्ध एवं संपुष्ट है। छत्तीसगढ़ी भाषा का संरक्षण एवं संवर्धन तथा सांस्कृतिक विरासत और पहचान को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है कि नयी पीढ़ी के कवि एवं कला साधक लोक कला , साहित्य सृजन एवं संगीत की दिशा में अपनी मूल संस्कृति को ध्यान में रखकर आधुनिकता की ओर क़दम बढ़ाएँ फ़कत लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण न करें।
रायपुर का सांस्कृतिक परिदृश्य-डॉ.माणिक विश्वकर्मा
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