धार्मिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं के बावजूद अक्सर लोगों के मन में स्वर्ग और नर्क को लेकर अक्सर ऊहापोह की स्थिति दिखाई देती है क्योंकि विज्ञान इस तरह के किसी भी स्थान की पुष्टि नहीं करता जहाँ मृत्यु के पश्चात मनुष्य का जाना होता हो। हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथ गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के पश्चात पुण्यात्माओं को स्वर्ग लोक अर्थात सुखद जीवन एवं पापियों को नर्क लोक में दंड और यातना युक्त जीवन की प्राप्ति होती है। इस्लाम धर्म में स्वर्ग को जन्नत एवं नर्क को दोजख तथा ईसाई धर्म में स्वर्ग को ईश्वर का घर और नर्क को आग की झील माना जाता है। स्वर्ग संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ होता है मेरु पर्वत के ऊपर। धार्मिक ग्रंथों में कर्मों के आधार पर मनुष्य स्वर्ग एवं नर्क लोक जाने की पात्रता प्राप्त करता है। मृत्यु के पश्चात शरीर को पूरी तरह निष्क्रिय होने में कभी – कभी चार से छ: मिनट तक का समय लग जाता है उस दौरान मस्तिष्क एवं श्रवण शक्ति के सक्रिय होने के कारण मृतक कुछ समय तक सुन एव समझ सकता है इसलिए कहा जाता है कि मृतक के पास मौन रहना चाहिए। पुराणों के अनुसार स्वर्ग लोक सूर्य एवं ध्रुव के मध्य स्थित है जहाँ अच्छे कर्म करने वाली आत्माएँ निवास करती हैं उन्हें वहाँ दिव्य सुख-शांति की प्राप्ति होती है। जबकि नर्क अर्थात यातना लोक दक्षिण दिशा में स्थित है जहाँ पापियों एवं दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वालों को यमदूतों द्वारा यातनाएं दी जाती हैं। यमलोक में अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा चित्रगुप्त द्वारा रखा जाता है। लेखा-जोखा के आधार पर यमराज मनुष्य को स्वर्ग या नर्क में भेजे जाने का निर्णय लेते हैं। कुछ प्रगतिवादी विचारधारा के लोग सुख- सुविधा युक्त जीवन को स्वर्ग एवं कष्टदायक व अभावग्रस्त जीवन को नर्क निरुपित करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में मन की आसक्ति ही बंधन अर्थात नरक एवं विरक्ति ही मोक्ष यानी स्वर्ग होता है कहा गया है। यथा-मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:। बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं मन:।। भगवद्गीता में नरक के तीन द्वारों का उल्लेख किया गया है- त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:। काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।। अर्थात काम, क्रोध और लोभ ये तीन नर्क के द्वार होते हैं। इसलिए इन तीनों से बचकर रहना चाहिए। कर्म के फल के संदर्भ में कहा गया है कि कर्मण: संग्रहात् स्वर्गनरकौ मोक्षबन्धने। बीजभावेन जायन्ते शरीरिणां शुभाशुभै:।। यानी मनुष्यों को शुभ एवं अशुभ कर्मों के आधार पर ही उसके स्वर्ग, नर्क, मोक्ष एवं बंधन निर्धारित होते हैं। महाभारत में स्वर्ग जाने का सहज मार्ग बताया गया है – सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव। नौ: सत्यं सत्यमास्थाय पारं याति नरो नरम्।। अर्थात सत्य स्वर्ग की सीढ़ी है। जिस प्रकार नाव से सागर पार करते है उसी प्रकार सत्य के बल पर भवसागर को पार किया जा सकता है। ईसाई धर्मानुसार स्वर्ग को ईश्वर का निवास माना जाता है, जहाँ उसके अनुयायी एवं विश्वासी जाते हैं, जबकि नर्क में वे लोग जाते हैं जो यीशु पर विश्वास नहीं करते। स्वर्ग-नर्क पर संत कबीर ने कहा है कि- सुरग नरक मैं रहा, सतगुरु के परसादि। चरण कँवल की मौज में, रहौ अंति अरु आदि।। यानी सतगुरु की कृपा-प्रसाद से, मैं अब स्वर्ग और नरक के चक्र से ऊपर उठ गया हूँ। मेरे लिए अब न कोई स्वर्ग का लालच है और न नरक का भय। मैं तो गुरु के चरण- कमल के प्रेम और मौज में लीन हूँ। अब आदि से लेकर अंत तक यानी हर समय मैं उसी दिव्य आनंद में डूबा रहता हूँ। दरअसल स्वर्ग और नर्क दोनों अपने भीतर होता है। यदि हम अपने विचारों, कर्मों एवं आचरण में कूड़ा भरते हैं अर्थात बुराइयां भरते हैं तो जीवन नर्क में तब्दील हो जाता है और यदि सत्य मार्ग के अनुगामी बनकर सनातन कर्म को अपनाते है तो जीवन में स्वर्ग की तरह परमानंद की अनुभूति होती है। इसलिए मनुष्य को अपने भीतर इतना धार्मिक एवं आध्यात्मिक आनन्द भरना चाहिए कि उसे बाहर के आनंद के पीछे भागने की जरूरत न पड़े। क्योंकि मृत्यु के पश्चात अच्छे कर्म ही दुनिया में याद किए जाते हैं और उन्हीं के आधार पर मोक्ष का निर्धारण होता है। ईश्वर ने सुख-दुख को जोड़कर संसार की रचना की है। यदि संसार से दुखों को निकाल दिया जाए तो संसार स्वर्ग में बदल जाएगा दूसरे शब्दों में कहें तो यदि मन से दुखों के कारणों को निकाल दिया जाए तो जीवन स्वर्ग में बदल जाएगा।
स्वर्ग एवं नर्क की अवधारणाएँ-डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘
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