यह कंकाल हमारे समाज और व्यवस्था का ही आईना है: रंजन श्रीवास्तव

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ओडिशा के एक आदिवासी जीतू मुंडा ने शिक्षा की कमी या बैंक कर्मियों की संवेदनहीनता के कारण मजबूरी में जो किया, वह हमारे समाज और व्यवस्था के गाल पर एक ऐसा ज़ोरदार तमाचा है जिसकी छाप को आने वाले दशकों तक किसी भी दवाई या मरहम से मिटाया नहीं जा सकता. सरकारी बैंकों द्वारा, चाहे वे शहरी इलाकों में ही क्यों न हों, ग्राहकों से असहयोग की खबरें अक्सर आती रहती हैं. बैंकों की कार्यप्रणाली पर न जाने कितने मीम्स सोशल मीडिया पर आए दिन देखे जा सकते हैं. पर सिर्फ बैंक ही क्यों, क्या यह घटना यह नहीं बताती कि दिल्ली से लेकर राज्यों तक की सरकारों के लाख ऊंचे-ऊंचे दावों के बावजूद देश के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा और व्यवस्थागत कमियों की बहुत ही भयावह स्थिति है. जीतू मुंडा की बहन कलरा मुंडा की मृत्यु इस वर्ष जनवरी में हो चुकी थी. उनके पति और बच्चे की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी और उस परिवार में कोई नहीं बचा था. मृत्यु के पश्चात कलरा मुंडा के सबसे करीबी रिश्तेदार जीतू मुंडा ही हैं, जो अपनी बहन के बैंक खाते में बचे हुए करीब 20,000 रुपये प्राप्त करने के लिए बार-बार बैंक के चक्कर काट रहे थे. जीतू मुंडा के अनुसार संबंधित ग्रामीण बैंक वाले बार-बार यह कह रहे थे कि अपनी बहन को लेकर आओ तभी रुपया मिलेगा, इसलिए उसे अपनी बहन के बचे हुए कंकाल को जमीन से खोदकर निकालना पड़ा जिसे एक कपड़े में लपेटकर वह बैंक पहुंचा जिससे कि बैंककर्मी संतुष्ट हो सकें. जबकि बैंक का अपनी सफाई में यह कहना है कि बैंक कर्मी जीतू मुंडा से उसकी बहन का मृत्यु प्रमाण पत्र मांग रहे थे और उस दस्तावेज़ की भी मांग कर रहे थे जिससे यह साबित हो कि जीतू मुंडा ही अपनी बहन का वास्तविक रिश्तेदार है. बैंक प्रबंधन ने स्पष्टीकरण जारी करके कहा कि उन्होंने कभी भी मृत व्यक्ति को सामने लाने की मांग नहीं की, बल्कि केवल मृत्यु प्रमाण पत्र और कानूनी दस्तावेज़ मांगे थे. बैंक का यह भी कहना है कि जीतू मुंडा शराब के नशे में था और नियमों को समझने के बजाय गुस्से में उसने यह कदम उठाया. इस हृदयविदारक घटना का संज्ञान ओडिशा की सरकार ने लिया और वहां के राजस्व मंत्री सुरेश पुजारी ने इस घटना को अत्यंत दुखद और अमानवीय बताया. साथ ही उन्होंने प्रशासन को दोषी बैंक कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया. देखा जाए तो बैंक अपनी जगह सही हो सकता है कि बिना किसी दस्तावेज़ के कैसे किसी को भी किसी मृत व्यक्ति के खाते का पैसा दिया जा सकता है. जीतू मुंडा के गांव के सरपंच ने भी स्वीकार किया कि मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने में देरी हुई. पर इस घटना से जो गंभीर सवाल उठे, वे यह थे कि क्या बैंककर्मियों ने एक आदिवासी की साक्षरता के स्तर को देखते हुए संवेदनशीलता का परिचय दिया? क्या उसे उचित तरीके से समझाने की कोशिश की गई थी और क्या वाकई किसी बैंककर्मी ने जीतू मुंडा से उसकी बहन को व्यक्तिगत रूप से लाने को कहा था? सवाल यह भी है कि जीतू मुंडा के गांव वालों, उसके रिश्तेदारों या सरपंच ने उसकी कितनी मदद करने की कोशिश की? अगर वाकई किसी बैंककर्मी ने उक्त आदिवासी से उसकी बहन को लेकर आने को कहा, तो इससे ज्यादा शर्मनाक और संवेदनहीन स्थिति क्या हो सकती है. सवाल यह भी है कि ग्रामीण भारत में खासकर आदिवासी इलाकों में साक्षरता की बुरी स्थिति क्यों है. शिक्षा की स्थिति तो और भी बुरी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2023-24 में ग्रामीण साक्षरता दर (सात वर्ष और उससे अधिक आयु वालों के लिए) 77.50′ थी, जिसमें कि लगभग 10′ की वृद्धि 2011 की तुलना में दर्ज की गई. पर आदिवासी इलाकों में साक्षरता का स्तर और भी बुरा है. 2011 की जनगणना के अनुसार ओडिशा में आदिवासियों की साक्षरता दर मात्र 52.24′ थी, जो राज्य की समग्र साक्षरता दर (72.9′) से बहुत ही कम थी. यानी आदिवासियों की लगभग आधी जनसंख्या साक्षरता से दूर थी. आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से बहुत से छोटे राज्यों में शिक्षा की स्थिति में काफी सुधार हुआ है, पर कई बड़े राज्यों में अभी बहुत सुधार की उम्मीद है. और यह स्थिति तब है जबकि कुछ रिपोर्ट्स में किए गए दावों के अनुसार जापान को पछाड़कर हम विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं. पर जब हम इस आर्थिक प्रगति के बीच देश के एक सुदूर इलाके में एक गरीब आदिवासी को अपने कंधे पर चादर में लपेटे अपनी बहन के कंकाल को बैंक ले जाते हुए देखते हैं, तो अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के बारे में हम क्या आकलन करें, यह एक बड़ा ही यक्ष प्रश्न है.