भोपाल गैस त्रासदी की वो सबसे मार्मिक तस्वीर, जिसने पूरी दुनिया को इस त्रासदी की भयावहता की कहानी सुनाई, आज भी सुना रही है, उस तस्वीर को खींचने वाले जाने माने फोटोग्राफर रघु राय का निधन एक सामान्य व्यक्ति का निधन नहीं कहा जा सकता। वह भारतीय फोटोग्राफी के चलते फिरते संग्रहालय थे। आजादी के बाद का भारत रघु की तस्वीरों में नजर आता है। उनकी तस्वीरें आजादी के बाद के बनते-बिगड़ते, उठते-गिरते-संभलते भारत की जीवंत दास्तान बताती हैं। इसलिए रघु राय को आजाद भारत का ‘विजुअल रिकॉर्डÓ यानी फोटो कथाकार भी कहा जाता है। 1942 में भारत में जन्मे रघु राय बचपन से ही फोटोग्राफी के शौकीन थे। अक्सर पिता के कैमरे से फोटो लिया करते थे। 1964 में रघु ने उन्होंने पिता के कहने पर सिविल इंजीनियरिंग की। 1965 में फोटोग्राफी शुरू की और जल्द फोटोग्राफी की दुनिया में उनकी ख्याति ने उन्हें इस दुनिया का कल्ट फिगर बना दिया। रघु राय ने अपने कैमरे से जो पहली तस्वीर ली थी वो लंदन टाइम्स में आधे पन्ने पर छपी थी। उन्होंने एक बार अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने बड़ी मशक्कत से एक गधे की तस्वीर ली थी, जिसे उनके बड़े भाई एस पॉल ने विदेश के कुछ अखबारों के लिए भेज दिया था और उनकी वो तस्वीर सिलेक्ट भी हुई और उसे लंदन टाइम्स में आधे पन्ने पर छपी थी। इसके लिए उन्हें मौटी रकम भी मिली थी। रघु राय काम के सिलिसिले में मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी और दलाई लामा जैसी बड़ी हस्तियों के करीब रहे। सभी हस्तियों की ज्यादातर क्लोज अप तस्वीरें उन्होंने ली, जो आज तक भी सबसे चर्चित हैं। उनकी तस्वीरों में वे इन हस्तियों के इमोशन को बखूबी कैप्चर करते थे। दलाई लामा पर उन्होंने किताब लिखी- अ गॉड इन एग्जाइल, जिसमें उन्होंने करीब 4 दशक तक की उनकी तस्वीरों को शामिल किया। रघु राय का भोपाल से परिचय कुछ ऐसा रहा कि गैस त्रासदी की सबसे मार्मिक तस्वीर उन्होंने खींची थी। असल में 1984 में भोपाल में यूनियन कार्बाइड प्लांट से जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट के रिसाव से लगभग 3,500 लोगों की तुरंत मौत हो गई थी। बाद के सालों में इससे पीडि़त करीब 15 हजार लोगों की मौत हुई। इस त्रासदी की तस्वीरें मैग्नम और दुनिया की कई मैगजीन्स में छपी। बरियल ऑफ एन अननोन चाइल्ड 2 दिसंबर 1984 को भोपाल में हुई गैस त्रासदी की सबसे मार्मिक तस्वीर है। कहा जा सकता है कि इसी तस्वीर से दुनिया ने इस त्रासदी के दर्द को पहचाना था। रघु राय की ये तस्वीर आज भी गैस त्रासदी का डॉक्यूमेंट मानी जाती है। रघु राय ने 1971 में बांग्लादेश लिबरेशन वॉर के दौरान भारत आए शरणार्थियों की तस्वीरें ली थीं, उन तस्वीरों में उन्होंने उनकी चिंताएं, बेचैनी और बेबसी कैद की, जो आज भी उस युद्ध के दहशत की याद दिलाती है। रघु ने इस युद्ध और 1971 में पाकिस्तानी आर्मी के सरेंडर को भी दर्ज किया है। इस दौरान ली गई बेहतरीन तस्वीरों के लिए 1972 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया। रघु राय ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मदर टेरेसा जैसी बड़ी हस्तियों की जिंदगी को तो तस्वीरों में कैद किया, लेकिन अपने समय की आम जिंदगी को असली रूप में कैप्चर करना उन्हें बेहद पसंद था। असल में 1960 के दशक से उनकी स्ट्रीट फोटोग्राफी में दिलचस्पी बढ़ी। यही कारण है कि सिनेमा की दुनिया ने उन्हें कभी प्रभावित नहीं किया। उन्होंने भारतीय जन जीवन की हजारों तस्वीरें ली। अपनी तस्वीरों में उन्होंने भारतीय संस्कृति और रोजमर्रा की जिंदगी को बेहद खूबसूरती से कैद किया है। मशहूर फ्रांसीसी फोटोग्राफर हेनरी कार्टियर ब्रेसन रघु के मेंटर थे। हेनरी, रघु के पेरिस में गैलरी डेलपायर एग्जिबिशन से काफी प्रभावित हुए। इसके बाद हेनरी ने 1977 में मैग्नम फोटोज के लिए नॉमिनेट किया। मैग्नम वल्डर््स प्रेस्टीजियस इंटरनेशनल फोटोग्राफर्स को-ऑपरेटिव ऑर्गेनाइजेशन है। इसमें दुनियाभर के टॉप फोटोग्राफर्स ही शामिल हो सकते हैं। 2017 में बेटी अवनी राय ने रघु राय: एन अनफ्रेम्ड डॉक्यूमेंट्री बनाई। इसे बॉलीवुड डायरेक्टर अनुराग बासु ने प्रोड्यूस की थी। रघु राय को फूल-पौधे बहुत पसंद थे। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, मुझे फोटोग्राफर से जितना प्यार है, उतना ही लगाव मुझे बागवानी से है। अगर मैं फोटोग्राफर नहीं होता तो पक्का माली होता। (शेष पृष्ठ 2 पर)
फोटोग्राफी के चलते फिरते संग्रहालय थे रघु राय – संजय सक्सेना
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