रायपुर। राजधानी रायपुर से सटे धरसींवा विधानसभा का ग्राम फरहदा आज “कब्जापुर” के नाम से पहचाना जाने लगा है। यहाँ दबंगई का आलम यह है कि, जीवितों के लिए खेल का मैदान तो दूर, मृतकों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए श्मशान तक नहीं बचा है। गांव के रसूखदारों ने करीब 450 एकड़ सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा जमा रखा है। स्थिति इतनी हृदयविदारक है कि किसी ग्रामीण की मृत्यु होने पर परिजनों को तालाब की मेड़ पर गड्ढा खोदकर शव दफनाने या अंतिम संस्कार करने को मजबूर होना पड़ रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि, कुछ दबंगों ने अकेले ही 40-50 एकड़ तक सरकारी जमीन दबा रखी है, जिससे गांव में अब पैर रखने तक की जगह नहीं बची है।

जमीन हड़पने का यह खेल सिर्फ श्मशान तक सीमित नहीं है। करीब 12 साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा घोषित खेल मैदान की भूमि भी रसूखदारों की भेंट चढ़ चुकी है। मवेशियों के लिए सुरक्षित घास भूमि (चारागाह) और गांव की रक्षा करने वाले सरकारी कोतवाल तक की जमीन को इन दबंगों ने नहीं छोड़ा। गांव का कोतवाल आज अपनी ही जमीन को कब्जामुक्त कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, लेकिन रसूख के आगे उसकी सुनवाई नहीं हो रही है। गांव के युवा सरपंच ने ग्राम सभा बुलाकर इन जमीनों को मुक्त कराने की मुहिम शुरू की है, लेकिन प्रशासन की चुप्पी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि, ये कब्जाधारी सत्ताधारी दल के बड़े नेताओं और स्थानीय विधायक के संरक्षण में फल-फूल रहे हैं, यही कारण है कि शिकायत के बावजूद तहसीलदार और एसडीएम स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है। पिछले 6 महीनों से ग्रामीण दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिल रहा है। हालांकि, मामला मीडिया में आने के बाद रायपुर कलेक्टर गौरव कुमार सिंह ने जांच कराकर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। अब देखना यह है कि, क्या प्रशासन वाकई उन रसूखदारों के चंगुल से सरकारी जमीन छुड़ा पाएगा या सियासत एक बार फिर न्याय पर भारी पड़ेगी।
