हमारे देश में तथाकथित धार्मिकों की मानसिकता देखकर तरस आता है. जब किसी धर्मस्थल में श्रद्धालुओं के साथ भेदभाव की खबरें आती हैं. वीआईपी-संस्कृति की तो खैर इस देश में निर्लज्ज अति है.कोई मंत्री है, कलेक्टर है या बहुत बड़ा नेता है, तो वह पहले भगवान के दर्शन करेगा.पूरा ट्रैफिक रोक दिया जाएगा. यह कौन-सी मानसिकता है? ईश्वर के दरबार में सब बराबर होने चाहिए. जैसा गुरुद्वारे में होता है. वहां अमीर-गरीब का कोई भेदभाव नहीं होता. हर कोई लाइन लगाकर वाहेगुरु, गुरु ग्रंथ साहिब को प्रणाम करता है. साथ में बैठकर लंगर छकता सकता है. बड़े-से-बड़ा व्यक्ति भी वहां जाकर अपनी सेवाएं देता है. जूठे बर्तन साफ करता है. लोगों के जूते-चप्पलों पर पॉलिश भी करता है. लेकिन मंदिरों में क्या होता है? किसी को अछूत कह कर उसे प्रवेश करने से रोक दिया जाता है. सबरीमाला मंदिर में तो 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश ही प्रतिबंधित है. भगवान का मंदिर तो सबके लिए खुला रहता है. नरसी मेहता का भजन ही है ‘सबके लिए खुला है मंदिर ये हमाराÓ. लेकिन सबके लिए मंदिर कहां खुला है? अगर हिंदुओं के मंदिर में दूसरे धर्म का व्यक्ति प्रवेश करना चाहे तो उसे प्रवेश करने नहीं दिया जाएगा. हिंदू धर्म का ही व्यक्ति अगर अनुसूचित जाति का है तो कई बार उसे भी प्रवेश करने नहीं दिया जाता. ऐसा करके दरअसल हिंदू धर्म के ठेकेदार प्रभु की सत्ता को ही चुनौती देते हैं. कोई भी भगवान न छुआछूत को मानेगा, न बलि प्रथा को. लेकिन हमारे यहां छुआछूत भी है, बलि प्रथा भी है. ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं, यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन यह का विषय नहीं होना चाहिए कि मंदिर में कौन जाएगा,कौन नहीं.भगवान का दर्शन सब के लिए खुला रहना चाहिए. वहां अगर कोई कलेक्टर भी आता है तो वह लाइन लगाकर प्रभु के दर्शन करे. अगर राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री भी आए तो कायदे से उनको भी लाइन से लगना चाहिए, वरना वह मंदिर में प्रवेश का कार्यक्रम ही न बनाएं,क्योंकि उनके आने से पूरी व्यवस्था बिगड़ती है और लोग घंटे परेशान होते हैं. मगर हमारा चाटुकार सिस्टम ऐसा है कि कोई तथाकथित वीआईपी आता है, तो बहुत पहले से ही आम लोगों का प्रवेश रोक दिया जाता है. और उस पर हम कहते हैं कि इस देश में लोकतंत्र है! जिस तंत्र में लोक की ही प्रतिष्ठा नहीं है, वह काहे का लोकतंत्र है? इसे लोकतंत्र की खाल में छिपा राजतंत्र ही कहेंगे. पता नहीं कब हमारा समाज एक महान दृष्टिकोण के साथ जीने की कोशिश करेगा और धर्मस्थलों में जो लोग ऊंची-नीची जाति या स्त्री-पुरुष का भेद करने की हरकत करते हैं, इससे मुक्त होगा. ऐसा नहीं है कि भेदभाव करने वाले बहुत बड़े धार्मिक हैं. अक्सर वे खुद बहुत बड़े घोटालेबाज होते हैं. मंदिर की आड़ में लूटपाट करते हैं. लेकिन यह सिस्टम वर्षों से चल रहा है.और आने वाले समय में भी शायद चलता रहेगा. धार्मिक स्थलों में करोड़ों का चढ़ावा आता है लेकिन उन चढ़ावों का अनेक स्थलों में कोई रचनात्मक इस्तेमाल नहीं होता. हां, मंदिर के रखरखाव में, उसकी और नई बिल्डिंग बनाने के काम में पैसे खर्च होते हैं, ताकि पैसों की आवक बनी रहे. लेकिन वहाँ जनकल्याणकारी कार्य नहीं होते. जैसे कहीं कोई बड़ा विद्यालय बनाया जा रहा है, अनाथालय बनाया जा रहा है, गरीबों की मदद की जा रही है. ऐसा कुछ नहीं. ज्यादातर धर्मस्थल किसी बड़ी दुकान में तब्दील होते नजर आ रहे हैं. इस प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए. और सबसे बड़ी बात, किसी भी मंदिर या मठ में प्रवेश के नाम पर कोई भेद नहीं होना चाहिए. वहां कोई फ़टेहाल व्यक्ति भी आए तो उसका स्वागत है. किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति भी श्रद्धा के साथ आए तो उसका अभिनंदन है. सबरीमाला में महिलाओं का भी स्वागत है. जब तक भारतीय समाज इतना उदार नहीं बनेगा, वह महान नहीं हो सकता.
धर्मस्थलों में भेदभाव – गिरीश पंकज
Follow Us
