दिल्ली के भलस्वा लैंडफिल का कूड़े का पहाड़ घट रहा, आखिर कहां ठिकाने लगाया जा रहा कचरा?

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नई दिल्ली। दिल्ली की भलस्वा लैंडफिल साइट पर वर्षों से खड़ा कूड़े का विशाल पहाड़ अब धीरे-धीरे कम हो रहा है। सालों तक यहां रोजाना बड़ी मात्रा में कचरा जमा होने से कूड़े का एक विशाल ढेर बन गया था। अब इसे हटाने का काम तेजी से चल रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, 31 जुलाई तक भलस्वा लैंडफिल से 99.07 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा हटाया जा चुका था।सरकार का लक्ष्य 31 दिसंबर 2026 तक भलस्वा लैंडफिल साइट को पूरी तरह साफ करना है। इसके लिए वर्षों से दबे कचरे को निकालकर उसकी छंटाई, प्रोसेसिंग और अलग-अलग तरीके से निस्तारण किया जा रहा है।

लेकिन सवाल यह है कि भलस्वा से निकल रहा इतना बड़ा कचरा आखिर जा कहां रहा है? क्या इसे किसी दूसरी जगह डंप किया जा रहा है या फिर इसका इस्तेमाल भी हो रहा है?

बायोमाइनिंग से निकाला जा रहा पुराना कचरा
मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) पुराने लैंडफिल की खुदाई के लिए बायोमाइनिंग तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। इसमें जमीन के नीचे वर्षों से दबे कचरे को मशीनों की मदद से खोदकर बाहर निकाला जाता है। इसके बाद कचरे को उसकी प्रकृति के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है।

इस प्रक्रिया का उद्देश्य सिर्फ कूड़े के पहाड़ की ऊंचाई कम करना नहीं है। बायोमाइनिंग के जरिए उपयोगी सामग्री को अलग किया जाता है और बाकी कचरे का निर्धारित प्रक्रिया के तहत निस्तारण किया जाता है।

65-75 फीसदी हिस्सा इनर्ट वेस्ट
बायोमाइनिंग के दौरान निकलने वाले कचरे में सबसे बड़ा हिस्सा इनर्ट वेस्ट का होता है। अधिकारियों के अनुसार, रोजाना प्रोसेस किए जाने वाले कचरे में करीब 65 से 75 फीसदी हिस्सा इनर्ट वेस्ट होता है। इसमें मुख्य रूप से छंटाई के बाद बचने वाली मिट्टी और अन्य ऐसी सामग्री शामिल होती है, जिसका दोबारा उपयोग सीमित तरीके से किया जा सकता है।इसके अलावा करीब 8 से 10 फीसदी कचरा कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन (सीएंडडी) वेस्ट होता है। इसमें टूटी कंक्रीट, ईंट और निर्माण या तोड़फोड़ से निकलने वाली अन्य सामग्री शामिल रहती है।

RDF को ईंधन के रूप में किया जा रहा इस्तेमाल
बायोमाइनिंग के बाद बची सामग्री में रिफ्यूज-डिराइव्ड फ्यूल (RDF) भी शामिल होता है। यह ऐसा प्रोसेस्ड कचरा है, जिसका इस्तेमाल ईंधन के तौर पर किया जा सकता है। इसे औद्योगिक इकाइयों में पारंपरिक ईंधन के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।इस तरह भलस्वा से निकलने वाले पूरे कचरे को एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर डंप करने के बजाय पहले उसकी छंटाई की जाती है और फिर सामग्री के प्रकार के अनुसार उसका इस्तेमाल या निस्तारण किया जाता है।

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नरेला और रोहिणी में भराव के लिए इस्तेमाल
अधिकारियों के अनुसार, बायोमाइनिंग से निकलने वाले इनर्ट वेस्ट और मलबे की बड़ी मात्रा को दिल्ली के निचले इलाकों में भेजा जाता है। नरेला और रोहिणी के कुछ हिस्सों में इसका इस्तेमाल जमीन के गड्ढों और निचले क्षेत्रों को भरने के लिए किया जाता है।वहीं, RDF को दिल्ली और आसपास की पेपर मिलों तथा सीमेंट फैक्ट्रियों में भेजा जाता है, जहां इसका इस्तेमाल औद्योगिक भट्टियों में कोयले के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।

कंस्ट्रक्शन वेस्ट का अलग निस्तारण
भलस्वा से निकलने वाले कंस्ट्रक्शन और डिमोलिशन वेस्ट को भी अन्य सामग्री से अलग किया जाता है। इसमें टूटी कंक्रीट, ईंटें और निर्माण एवं तोड़फोड़ से जुड़ी दूसरी सामग्री शामिल होती है। छंटाई के बाद इस सामग्री का निर्धारित प्रक्रिया के तहत निस्तारण किया जाता है।

31 जुलाई तक हटाया गया 99.07 लाख मीट्रिक टन कचरा
अधिकारियों के मुताबिक, 31 जुलाई तक भलस्वा लैंडफिल से 99.07 लाख मीट्रिक टन पुराना कचरा हटाया जा चुका था। अब बचे हुए कूड़े के पहाड़ को भी तेजी से हटाने का काम जारी है। अधिकारियों को उम्मीद है कि कूड़े का बचा हुआ ढेर 15 अक्टूबर तक हटा दिया जाएगा।

इसके बाद पूरी डंपिंग साइट को साफ करने के लिए 31 दिसंबर 2026 की समयसीमा तय की गई है।
भलस्वा में चल रही प्रक्रिया से यह स्पष्ट है कि लैंडफिल के पुराने कचरे को सिर्फ दूसरी जगह ले जाकर जमा करने के बजाय उसे अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उपयोग और निस्तारण की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निकाली गई सामग्री का अंतिम और पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित निस्तारण कितनी प्रभावी तरीके से किया जाता है।