कोलकाता। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी अपने राजनीतिक जीवन के सबसे काले दौर से गुजर रही हैं। 15 साल बाद बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद अब उनके हाथ से अपनी पार्टी भी खिसकती नजर आ रही है। इस पूरे सियासी पतन की सबसे कमजोर कड़ी बनकर उभरे हैं उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी। भाजपा के साथ-साथ अब टीएमसी के असंतुष्ट नेता भी अभिषेक बनर्जी को ‘कट-मनी’ और सिंडिकेट राज का किंगपिन बता रहे हैं। कोयला तस्करी, मवेशी तस्करी और शिक्षक भर्ती घोटाले जैसे गंभीर मामलों में केंद्रीय एजेंसियों (ED-CBI) की जांच की सुई हमेशा अभिषेक के इर्द-गिर्द घूमती रही, जिसने ममता की सादगी वाली छवि को भारी नुकसान पहुंचाया। अभिषेक के इर्द-गिर्द बने कॉर्पोरेट घेरे ने जमीन की वास्तविक नाराजगी को ममता तक पहुंचने ही नहीं दिया और ममता ने उन्हें रोकने के बजाय ‘फ्री हैंड’ दे दिया।

नतीजतन, अब टीएमसी के भीतर दो-फाड़ होने की नौबत आ गई है। सिग्नेचर फर्जीवाड़ा विवाद के बाद निष्कासित किए गए विधायकों (ऋतब्रत बंदोपाध्याय और संदीपान साहा) के बाद बगावत चरम पर है। निष्कासित नेता रिजू दत्ता ने बड़ा दावा किया है कि करीब 50 विधायकों ने गुप्त बैठक की है और वे ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ होने का दावा ठोकते हुए चुनाव चिह्न पर कब्जा करने की तैयारी में हैं। ममता बनर्जी की पार्टी पर पकड़ इस कदर कमजोर हो चुकी है कि हाल ही में उनके एक बड़े विरोध प्रदर्शन में 80 में से सिर्फ 8 विधायक और 41 में से केवल 6 सांसद ही पहुंचे। साफ है कि टीएमसी के भीतर की दरार अब इतनी गहरी हो चुकी है, जिसे पाटना नामुमकिन लग रहा है।

