मित्रता- सद्भावना को जगाता है जन्माष्टमी पर्व-विजय मिश्रा

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एक हाथ दोस्ती का बढ़ाकर तो देखिए, किसी भूखे गरीब को रोटी खिलाकर तो देखिए। मिलने लगेंगी खुशियां अपने आप आपको, किसी के पांव में गड़ा हुआ कांटा निकाल कर तो देखिए। कविवर की ए पंक्तियां द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण की उदार सोच पर खरा उतरती हैं। ऐसी उदारमना सोच के कारण ही वे जगत प्रिय देव हैं। उनका जन्मोत्सव जन्माष्टमी पर्व जनजन को मोहित करता है। जन्माष्टमी एक बालक का जन्म दिवस मात्र नहीं है बल्कि सच्चे अर्थों में यह दिवस भेदभाव रहित सेवा, नि:स्वार्थ पूर्ण मित्रता और बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का उदघोष करने वाला दिवस है। ऐसे उद्घोष को आजीवन अपने कथनी करनी में अमल में लाने वाले कान्हा का जन्म दिवस है। अपने जीवन में उन्होंने सद्भावना- सहयोग- सदाचार और मैत्रीभाव को बनाए रखने के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। यही वजह है कि भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि आते ही भारत ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों का संपूर्ण वातावरण एक दिव्य ऊर्जा से ओत प्रोत हो जाता है। बच्चे- बूढ़े उमंग और उल्लास में डूबे हुए ‘हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल कीÓ का जयघोष करते हैं। गांव- शहर इस जयघोष से गुंजायमान हो उठता है। शक्ति रियासत के राज पुरोहित शिवकुमार चौबे कहा करते थे कि- सनातन संस्कृति में जन्माष्टमी महज एक व्रत- पूजा का दिन ही नहीं है, बल्कि जनमन के भीतर नवचेतना को जागृत करने वाला महाउत्सव है।असुर, अधर्मी की तरह आचार विचारयुक्त दिनचर्या के बजाय धार्मिक आचरणों को जीवन में उतारने के लिए यह पर्व प्रेरित करता है। धर्म-कर्म से अभीष्ट की आपूर्ति सुनिश्चित होने का शंखनाद भगवान श्री का जीवन करता है। कर्म और आनंद के प्रदाता श्रीकृष्ण का चरित्र किसी एक सांचे में बंधा हुआ नहीं है। एक ओर तो वे गीता के उपदेशक के रूप में जीवन के सबसे कठिन दर्शन को बड़ी सरलता से समझाते हैं, वहीं माखनचोर, मुरलीधर और रास रचैया के रूप में जीवन को उत्सव मानिंद जीने की प्रेरणा भी देते हैं। मथुरा नरेश क्रूर कंस के अत्याचारों के विरुद्ध खड़े होकर, निर्भयता पूर्वक उससे जूझते हुए उसका अंत करके श्री कृष्ण ने संदेश दिया कि स्व की रक्षा के लिए खड़े होने वाले की मदद ईश्वर अवश्य करते हैं। गरीब सुदामा के साथ उनकी सच्ची मित्रता, उनका प्रगाढ़ प्रेम आज के दौर में नि:स्वार्थ रिश्तों की सबसे बड़ी मिसाल है। इसीलिए जीवन को संपूर्णता से जीने के दर्शन का महापर्व जन्माष्टमी है। नव पीढ़ी जेन जी जेन अल्फा के साथ पुरानी पीढ़ी का अनूठा संगम इस पर्व में परिलक्षित होता है।अपनी जड़ों से जुड़ी हुई युवा पीढ़ी का जुड़ाव इस पर्व में उत्साह जनक दिखाई देता है। बढ़ चढ़कर युवाओं द्वारा दी जाने वाली भागीदारी ने इस पर्व को अत्यधिक रंगीन और दिलचस्प बना दिया है। जन्माष्टमी पर्व के स्वरूप और तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव आ गया है। पौराणिक घटनाओं को वर्तमान संदर्भ से जोड़कर एक से बढ़कर एक थीम बेस्ड डिजीटल झांकियों की नयनाभिराम प्रस्तुतियां होने लगी हैं। कंस वध, कालिया नाग मर्दन गोवर्धन पर्वत, सुदामा भेंट, कुरूप कुबजा वृद्धा को सुंदर स्वरूप देने, महाभारत का द्रौपदी प्रसंग चलित झांकियों में जीवंत दृष्टव्य होते हैं। पहले की तरह अब केवल चमकीले कागज, कपड़े, मिट्टी- लकड़ी के खिलौनों से झांकियां नहीं सजतीं। अब तो नई पीढ़ी ने लाइटिंग की मार्डन टेक्नोलॉजी सहित थ्री डी प्रोजेक्शन और मोशन सेंसर को झांकियों में समाहित करके जन्माष्टमी झांकी के प्रति जनाकर्षण को बढ़ा दिया है। कह सकते हैं कि जन्माष्टमी में प्राचीन परंपरा और आधुनिकता का सुंदर समन्वय दिखता है। कान्हा के प्रति अगाध श्रद्धा, उपवास का नियम और अर्धरात्रि को बाल-गोपाल के प्राकट्य पर होने वाला उत्सव आज भी वही है जो सदियों पहले था। इसे अक्षुण्ण बनाए हुए कान्हा की पूजा के साथ ही उनके विचारों को भी आत्मसात करें। कर्म को ही पूजा बनाए हुए जीवन के हरेक पल को उत्सव की तरह जिएं। रहें प्रेम से कहें दिल से- कर्म तेरा अच्छा है, तो किस्मत तेरी दासी है। नियत तेरी साफ है, तो घर में मथुरा काशी है।
                  द्वारिकाधीस की जय हो।