नेपाल की मर्मांतक त्रासदी ने एक बार फिर पूरे हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को सामने ला दिया है। इसे केवल नेपाल की स्थानीय आपदा मानकर आगे बढ़ जाना बड़ी भूल होगी। पिछले दो दशकों में केदारनाथ, सिक्किम, धराली और हिमालय के दूसरे हिस्सों में सामने आई घटनाएं लगातार एक ही सवाल पूछ रही हैं—क्या हम हिमालय को उसकी प्रकृति और सीमाओं के अनुरूप समझ भी रहे हैं? कहीं हम हिमालय के साथ ज्यादती तो नहीं कर रहे हैं? हमारा दुर्भाग्य यह है कि ऐसी हर त्रासदी के बाद चर्चा कुछ समय तक चलती है और फिर विकास की वही पुरानी प्राथमिकताएं लौट आती हैं। सडक़ों का विस्तार, बड़े निर्माण, बांध, सुरंगें और तेजी से बढ़ता पर्यटन जरूरी हो सकते हैं, लेकिन हिमालय जैसे नाजुक क्षेत्र में इनका पैमाना और तरीका क्या होना चाहिए, इस सवाल का जवाब अभी भी हमारी नीतियों में स्पष्ट दिखाई नहीं देता। जहां तक हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की बात है, तो अक्सर आपदाओं के संदर्भ में सबसे पहले उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। कहीं अवैध निर्माण को जिम्मेदार बताया जाता है, कहीं अतिक्रमण को और कहीं स्थानीय आबादी की गतिविधियों को, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। सच यह है कि हिमालय के मूल लोग स्वयं भी इन आपदाओं के सबसे बड़े पीडि़त हैं। जिस पारिस्थितिकी पर उनकी आजीविका निर्भर है, उसके असंतुलन का सीधा असर उन्हीं के जीवन पर पड़ता है। इसलिए सवाल यह होना चाहिए कि विकास की योजनाएं बनाते समय हिमालय की भौगोलिक और पारिस्थितिक सीमाओं को कितना महत्व दिया गया। यह कहा जा रहा है कि नेपाल की त्रासदी भूकंप के कारण नहीं आई, अपितु ग्लेशियरों के टूटने से आई है। वैज्ञानिक रूप से किसी एक घटना के पीछे एक ही कारण तय करना आसान नहीं होता। भूकंप, अत्यधिक बारिश, ग्लेशियरों का पिघलना, ग्लेशियल झीलों का फटना और भू-स्खलन जैसी कई प्रक्रियाएं एक-दूसरे से जुड़ सकती हैं। जलवायु परिवर्तन इस पूरी तस्वीर को और जटिल बना रहा है। बढ़ता तापमान हिमालयी ग्लेशियरों और बर्फीली संरचनाओं को प्रभावित कर रहा है। इसलिए किसी एक आपदा को केवल एक प्राकृतिक घटना मान लेना पर्याप्त नहीं है। हमें उन दीर्घकालिक बदलावों को भी समझना होगा, जो हिमालय को पहले की तुलना में अधिक अस्थिर बना रहे हैं। हिमालय को प्रशासनिक और राजनीतिक सीमाओं में बांट देना अपेक्षाकृत आसान रहा है। अलग-अलग राज्यों और देशों में इसका विभाजन हुआ, सीमावर्ती इलाकों के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्थाएं बनीं और आर्थिक विकास के लिए योजनाएं तैयार की गईं। लेकिन हिमालय इन राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानता। एक नदी का जलग्रहण क्षेत्र कई प्रशासनिक सीमाओं से गुजर सकता है। एक ग्लेशियर के पिघलने का असर कई घाटियों और देशों तक पहुंच सकता है। एक भूस्खलन नदी के प्रवाह को प्रभावित कर सकता है और उसका असर सैकड़ों किलोमीटर दूर तक दिखाई दे सकता है। इसलिए हिमालय के लिए नीति भी नदी, घाटी और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को केंद्र में रखकर बनानी होगी, न कि केवल राज्य या जिले की सीमा के आधार पर। पिछले लगभग दो सौ वर्षों में बड़े पैमाने पर हुआ कार्बन उत्सर्जन आज पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन चुका है। इसका प्रभाव केवल तापमान बढऩे तक सीमित नहीं है। समुद्र, वायुमंडल, वर्षा चक्र, हिमनद और पारिस्थितिकी—सभी इससे प्रभावित होते हैं। समुद्र पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था के महत्वपूर्ण नियंत्रकों में हैं। महासागरों में होने वाले बदलावों का असर वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ता है। इसका प्रभाव मानसून के व्यवहार में भी दिखाई दे सकता है। इसीलिए आज बारिश का स्वरूप पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित महसूस होता है। कहीं लंबे समय तक बारिश नहीं होती और कहीं बेहद कम समय में असाधारण वर्षा हो जाती है। क्लाउडबस्र्ट और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएं जब पहाड़ी क्षेत्रों में होती हैं तो उनका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। हिमालयी आपदाओं की एक बड़ी विशेषता यह है कि यहां केवल पानी नहीं बहता। पानी अपने साथ चट्टान, मिट्टी, पेड़, पत्थर और निर्माण सामग्री का भारी मलबा भी लेकर आता है। यही मलबा बाढ़ को और घातक बना देता है। घर ढहते हैं, सडक़ें टूट जाती हैं, पुल बह जाते हैं और कई बार पूरे गांवों का संपर्क बाहरी दुनिया से कट जाता है। राहत और बचाव दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि जिस रास्ते से उन्हें प्रभावित लोगों तक पहुंचना है, वही रास्ता आपदा में खत्म हो चुका होता है।
नेपाल जैसी त्रासदी में यदि बांध, सडक़ें, पुल और अन्य बुनियादी ढांचा भी प्रभावित हो जाए तो संकट कई गुना बढ़ जाता है। हिमालय में विकास जरूरी है। वहां रहने वाले लोगों को सडक़, अस्पताल, स्कूल, इंटरनेट, रोजगार और बेहतर जीवन की सुविधाएं मिलनी ही चाहिए। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि मैदानी इलाकों में इस्तेमाल होने वाला वही मॉडल पहाड़ों पर भी लागू कर दिया जाए। हिमालय की अपनी वहन क्षमता है। उसकी भौगोलिक संरचना, ढलान, जल स्रोत, जंगल और नदियां एक बेहद नाजुक संतुलन पर टिके हैं। इस संतुलन के साथ बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ का असर कभी-कभी वर्षों बाद दिखाई देता है, लेकिन जब दिखाई देता है तो उसकी कीमत बहुत बड़ी होती है। इसलिए हिमालय में किसी परियोजना की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि उससे कितने किलोमीटर सडक़ बनी या कितनी बिजली पैदा हुई। यह भी देखा जाना चाहिए कि उस परियोजना ने स्थानीय पारिस्थितिकी पर कितना दबाव डाला और भविष्य की आपदाओं का जोखिम कितना बढ़ाया। यह केवल कुछ हजार लोगों की जान-माल की क्षति का सवाल नहीं है। हिमालय से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों के जीवन और आजीविका से जुड़ी हैं। यदि हिमालयी पारिस्थितिकी लगातार अस्थिर होती गई तो इसका प्रभाव पहाड़ों से निकलकर मैदानों और अंतत: पूरे दक्षिण एशिया तक पहुंच सकता है। नेपाल से लेकर भारत के हिमालयी राज्यों तक सामने आई घटनाओं को अलग-अलग हादसों के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक पैटर्न के तौर पर समझने की जरूरत है। केदारनाथ ने चेताया था। सिक्किम ने चेताया। धराली ने चेताया। अब नेपाल की त्रासदी भी उसी चेतावनी को और गंभीर बना रही है।
फिर चेताया हिमालय ने- संजय सक्सेना
Follow Us
