नई दिल्ली । देश में पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड की गुणवत्ता को लेकर बहस तेज हो गई है। सरकार की ओर से ऐसे खाद्य उत्पादों पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लगाने के प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है, जिनमें शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक है। इस प्रस्ताव को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों और खाद्य उद्योग के बीच मतभेद भी सामने आए हैं।
शुगर, नमक और फैट पर रहेगी नजर
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर सामने की तरफ लाल रंग के चेतावनी संकेत लगाने की योजना है। मौजूदा प्रस्ताव में तब चेतावनी देने की बात है जब किसी उत्पाद में निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में कम से कम दो पोषक तत्व—एडेड शुगर, नमक या सैचुरेटेड फैट—मौजूद हों।स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे लेबल उपभोक्ताओं को खरीदारी के समय अधिक जानकारीपूर्ण फैसला लेने में मदद कर सकते हैं। वहीं, खाद्य उद्योग से जुड़े लोगों ने प्रस्तावित मानकों और उनके संभावित असर को लेकर आपत्तियां जताई हैं।
खाद्य सुरक्षा पर बढ़ा सरकारी जोर
भारत में खाद्य सुरक्षा को लेकर हाल के दिनों में जांच और कार्रवाई भी तेज हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2020 से हर साल जांचे गए खाद्य नमूनों में लगभग पांचवां हिस्सा असुरक्षित या मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया है। पिछले तीन वर्षों में करीब 8,000 खाद्य लाइसेंस रद्द किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।विशेषज्ञों के मुताबिक, बाजार में तेजी से बढ़ रहे पैकेज्ड फूड और क्विक-कॉमर्स के दौर में खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और लेबलिंग पर प्रभावी निगरानी जरूरी है।
उपभोक्ताओं के लिए क्यों जरूरी है चेतावनी लेबल?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादा शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले खाद्य पदार्थों का लगातार सेवन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। ऐसे में पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी उपभोक्ताओं को उत्पाद चुनने से पहले उसकी पोषण संबंधी जानकारी समझने में मदद कर सकती है।फिलहाल चेतावनी लेबल को लेकर नियमों और मानकों पर चर्चा जारी है। प्रस्ताव को लेकर कानूनी चुनौती भी सामने आई है और सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर मामला पहुंच चुका है।
